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NGT और हाईकोर्ट के आदेश भी बेअसर? तालाब की जमीन पर सामुदायिक भवन निर्माण से नईगढ़ी में हड़कंप

मीडिया ऑडीटर, नईगढ़ी। नईगढ़ी जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत मऊहरिया में सरकारी तालाब की भूमि पर सामुदायिक भवन निर्माण का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। आरोप है कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सख्त नियमों और न्यायालयीय आदेशों की अनदेखी करते हुए यह निर्माण कार्य कराया जा रहा है जिससे स्थानीय स्तर पर आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

शिकायतकर्ता ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद तालाब की जमीन पर निर्माण जारी है। मामले में ग्राम पंचायत के सरपंच और संबंधित इंजीनियर की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।

शिकायत में उल्लेख किया गया है कि तालाब पोखर और अन्य जलस्रोत केवल राजस्व अभिलेखों तक सीमित नहीं होते बल्कि यह ग्रामीण जल-संरचना की आधारशिला होते हैं। ऐसे में इन स्थलों पर किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

प्रकरण से जुड़े दस्तावेजों में शिकायत-पत्र के साथ-साथ न्यायालयीय आदेशों का हवाला दिया गया है। वहीं स्थल की तस्वीरें भी संलग्न की गई हैं जिनमें निर्माणाधीन भवन, तालाब के समीप दीवारें, छत निर्माण और जीपीएस लोकेशन के साथ तस्वीरें साफ तौर पर दिखाई दे रही हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि निर्माण कार्य केवल प्रस्तावित नहीं बल्कि तेजी से आगे बढ़ चुका है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि तालाब की जमीन पर इस प्रकार का निर्माण होता है तो भविष्य में जलभराव, जल निकासी और ग्रामीण उपयोगिता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यह न केवल सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण का मामला है बल्कि पर्यावरणीय कानूनों की खुली अवहेलना भी है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जलाशयों के संरक्षण को लेकर NGT और उच्च न्यायालय समय-समय पर सख्त रुख अपनाते रहे हैं तब नईगढ़ी क्षेत्र में यह निर्माण आखिर किसके संरक्षण में हो रहा है। क्या संबंधित विभागों ने स्थल निरीक्षण किया? क्या राजस्व और पंचायत अमले ने भूमि की प्रकृति की जांच की? और यदि यह भूमि तालाब की है तो निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी गई?

ग्रामीणों में इस पूरे मामले को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि एक ओर सरकार जल संरक्षण और अमृत सरोवर जैसी योजनाओं का प्रचार कर रही है वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर तालाबों की जमीन पर ही निर्माण कराया जा रहा है।

मामले में प्रशासन से मांग की गई है कि तत्काल निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाए राजस्व अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने पर संबंधित सरपंच, इंजीनियर एवं अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

मीडिया एंगल:
मऊहरिया का यह मामला सिर्फ एक पंचायत तक सीमित नहीं है बल्कि यह बड़ा सवाल खड़ा करता है क्या गांवों के तालाब अब केवल कागजों में ही बचेंगे? अगर न्यायालयों के आदेश भी जमीन पर लागू नहीं हो पा रहे, तो आखिर जलाशयों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?

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