
रीवा जिले में समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। किसानों की मेहनत की फसल की सुरक्षा के लिए बनाए गए खरीदी केंद्रों में कथित अनियमितताओं और गेहूं की संदिग्ध निकासी के आरोपों ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर जब अधिकारी लगातार बैठकें कर रहे थे निरीक्षण के दावे किए जा रहे थे और निगरानी तंत्र सक्रिय बताया जा रहा था तब खरीदी केंद्रों से गेहूं बाहर कैसे पहुंचता रहा?
हाल ही में ईटहा-हरिहरपुर खरीदी केंद्र से जुड़े मामले ने पूरे जिले में चर्चा छेड़ दी है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि किसानों से खरीदे गए गेहूं के रखरखाव और भंडारण में गंभीर लापरवाही बरती गई। वहीं यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि खरीदी केंद्र से अनाज की निकासी लंबे समय से जारी थी लेकिन जिम्मेदार अधिकारी केवल कागजी कार्रवाई और बैठकों तक सीमित रहे।
जानकारों का कहना है कि खरीदी सीजन के दौरान जिला प्रशासन खाद्य विभाग और संबंधित एजेंसियों द्वारा नियमित समीक्षा बैठकें आयोजित की जाती हैं। एसडीएम स्तर से लेकर जिला स्तर तक निरीक्षण और मॉनिटरिंग के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद यदि किसी खरीदी केंद्र में अनियमितता होती है तो यह निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि कई बार शिकायतें करने के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं हुई। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि अधिकारी जांच टीम भेजते रहे रिपोर्टें बनती रहीं लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दिया। इसी बीच खरीदी केंद्रों से अनाज की संदिग्ध आवाजाही की चर्चाएं लगातार सामने आती रहीं।
मामले को लेकर संभागीय स्तर तक शिकायत पहुंचने के बाद कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। बताया जा रहा है कि शिकायत पर जांच के निर्देश भी दिए गए हैं। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी या वास्तव में पूरे प्रकरण की निष्पक्ष पड़ताल होगी।
किसानों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि शासन ने अधिकारियों को जनता की सेवा पारदर्शिता और शासकीय संपत्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी है। ऐसे में यदि किसानों की उपज की सुरक्षा पर ही सवाल खड़े होने लगें तो यह चिंता का विषय है। लोगों का कहना है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों का दायित्व केवल बैठकों तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर परिणाम भी सुनिश्चित करने चाहिए।
इस पूरे मामले में कई सवा अब भी जवाब मांग रहे हैं। यदि खरीदी केंद्र में अतिरिक्त गेहूं था तो उसका रिकॉर्ड क्या था? यदि अनाज की निकासी हुई तो किसके आदेश पर हुई? निगरानी तंत्र को इसकी जानकारी क्यों नहीं लगी? और यदि शिकायतें पहले से मिल रही थीं तो समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
रीवा जिले की प्रशासनिक व्यवस्था पर उठ रहे इन सवालों के बीच किसान और आम नागरिक निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि दोषियों की पहचान कर कठोर कार्रवाई नहीं की गई तो सरकारी खरीदी व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर होगा।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर जवाबदेही तय करता है या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह जांच फाइलों तक सिमट कर रह जाता है।







