नोएडा DM मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से राहत, ₹5 लाख मुआवजे के आदेश पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम को फिलहाल राहत दी है। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2 सितंबर के फैसले के संबंधित हिस्सों पर अंतरिम रोक लगा दी। रोक खास तौर पर हाईकोर्ट के पैराग्राफ 27 से 33 पर है, जिनमें डीएम के खिलाफ टिप्पणियां और पांच लाख रुपये की वसूली का निर्देश शामिल था।
क्या था पूरा मामला?
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिक प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शन के सिलसिले में दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहास स्नातक आकृति चौधरी को गिरफ्तार किया गया था और बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम यानी NSA के तहत हिरासत आदेश जारी किया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को इस हिरासत आदेश को रद्द कर दिया था और आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने डीएम की भूमिका पर उठाए थे सवाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में डीएम मेधा रूपम की भूमिका पर कड़ी टिप्पणियां की थीं। अदालत ने मुआवजे की राशि उनकी सैलरी से वसूलने के साथ उन अन्य अधिकारियों तक जिम्मेदारी तय करने का निर्देश दिया था, जो हिरासत की प्रक्रिया से जुड़े थे। हाईकोर्ट ने अधिकारियों की सेवा पुस्तिका में अपनी नाराजगी दर्ज करने की बात भी कही थी।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई?
मेधा रूपम की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने डीएम को नोटिस दिए बिना उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां कीं और पांच लाख रुपये की वसूली का आदेश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि हिरासत आदेश को रद्द करना अलग विषय है, जबकि उसे जारी करने वाले अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना अलग सवाल है।
NSA की प्रक्रिया पर क्या बताया गया?
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि NSA के तहत हिरासत की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है। उनके अनुसार प्रस्ताव पुलिस के स्तर से शुरू होकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और फिर जिलाधिकारी तक पहुंचता है। इसके बाद मामले की वैधानिक समीक्षा और सरकार के स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ती है। इसी आधार पर उन्होंने दलील दी कि डीएम को पूरी प्रक्रिया के लिए अकेले जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए।
NSA आखिर क्या है?
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 एक निवारक निरोध कानून है। इसका इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या आवश्यक आपूर्ति से जुड़े खतरों को रोकने के लिए किया जा सकता है। NSA के तहत हिरासत सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी से अलग कानूनी व्यवस्था है और इसके लिए कानून में निर्धारित समीक्षा और पुष्टि की प्रक्रिया होती है।
अब 7 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को सूचीबद्ध की गई है। फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्से पर अंतरिम रोक है; अंतिम फैसला मामले की मेरिट पर सुनवाई के बाद होगा। सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी 23 सितंबर 2026 के इस मामले का आदेश दर्ज है।इस मामले में फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का आदेश अंतरिम है। एक तरफ हाईकोर्ट ने NSA हिरासत की वैधता और अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए थे, वहीं सुप्रीम कोर्ट में डीएम की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर अलग कानूनी दलीलें सामने आई हैं। अब 7 अक्टूबर की सुनवाई पर आगे की तस्वीर स्पष्ट होगी।





