
कहीं 8-10 जवानों के भरोसे पूरा थाना, तो कहीं बंगले की सुरक्षा और व्यवस्थाओं में 15-20 जवान लगाए जाने की चर्चा! अपराधियों से लड़े कौन, जनता की फरियाद सुने कौन? आखिर पुलिस बल जनता के लिए है या साहबों की सुविधा के लिए?
रीवा। रीवा रेंज की पुलिस व्यवस्था में जवानों की तैनाती को लेकर एक ऐसा सवाल खड़ा हो रहा है, जिसका जवाब पुलिस महकमे के आला अधिकारियों को देना चाहिए। एक तरफ थानों में पुलिस बल की कमी का रोना है दूसरी तरफ अधिकारियों के बंगलों पर जवानों की तैनाती को लेकर चर्चाएं हैं। कहीं एक थाना महज 8 से 10 जवानों के सहारे चलने की बात सामने आती है तो कहीं बंगले की सुरक्षा, ड्राइवर, गार्ड और अन्य व्यवस्थाओं में 15 से 20 जवानों की तैनाती के दावे किए जा रहे हैं। अगर यह तस्वीर सही है तो सवाल सीधा है थानों को जवान नहीं और बंगलों को पूरी फौज क्यों?
थाने में फरियादी परेशान, मैदान में जवान नदारद!
पुलिस की सबसे पहली जिम्मेदारी जनता की सुरक्षा है। चोरी, लूट, हत्या, मारपीट, महिला अपराध, नशे के कारोबार पर कार्रवाई रात्रि गश्त और अपराधियों की धरपकड़ जैसे काम थानों से ही होते हैं। लेकिन जब थाना ही सीमित पुलिस बल के भरोसे हो तो अपराधियों पर प्रभावी नियंत्रण कैसे होगा?एक थाना क्षेत्र में सैकड़ों गांवों की जिम्मेदारी होती है। न्यायालयीन कार्य, पेशी, विवेचना, वीआईपी ड्यूटी और अन्य विभागीय कामों में जवानों की तैनाती के बाद कितने पुलिसकर्मी जनता के लिए उपलब्ध बचते हैं? क्या कभी इसकी वास्तविक समीक्षा हुई है?
साहब का बंगला सुरक्षित, थाना कितना सुरक्षित?
सबसे बड़ा सवाल अधिकारियों के बंगलों पर तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या को लेकर है। यदि माली, ड्राइवर, गार्ड और दूसरी व्यवस्थाओं के नाम पर 15 से 20 जवान लगाए जाने की शिकायतें सही हैं, तो यह जानना जरूरी है कि आखिर किस आदेश और किस सुरक्षा आकलन के आधार पर इतनी तैनाती की गई है। अधिकारी की सुरक्षा जरूरी है लेकिन क्या एक आम नागरिक की सुरक्षा कम जरूरी है? क्या बंगले पर तैनात अतिरिक्त जवानों को जरूरत के हिसाब से थानों में नहीं लगाया जा सकता?
थाना प्रभारी पर जवाबदेही, लेकिन स्टाफ देने वाला कौन?
मैदानी पुलिस अधिकारियों की परेशानी भी गंभीर है। एक थाना प्रभारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि स्टाफ की कमी और लगातार ड्यूटी के दबाव के चलते काम करना मुश्किल होता जा रहा है। दिन-रात की ड्यूटी सीमित जवान और ऊपर से हर मामले की जवाबदेही थाना प्रभारी पर होती है। ऐसे हालात में पुलिसकर्मियों का मानसिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
मुख्यमंत्री के निर्देश भी क्या फाइलों में कैद रह गए?
अप्रैल 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों के बंगलों पर नियम से अधिक तैनात पुलिसकर्मियों और कर्मचारियों की संख्या कम कर उन्हें थानों तथा जनहित के कार्यों में लगाने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद यदि ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो सवाल है कि निर्देशों का पालन कितना हुआ?
आखिर पुलिस की प्राथमिकता क्या है थाने में बैठा फरियादी या बंगले के बाहर खड़ा पहरेदार?
जिस थाने में फरियादी घंटों इंतजार करता है जहां गश्त के लिए जवान कम पड़ जाते हैं और जहां अपराधियों की तलाश में पुलिस को अतिरिक्त बल की जरूरत होती है वहां पुलिसकर्मियों की कमी क्यों बनी हुई है? बंगले की सुरक्षा का विरोध नहीं लेकिन जनता की सुरक्षा की कीमत पर किसी भी व्यवस्था को उचित नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि वर्दी की असली ताकत साहब के बंगले की पहरेदारी नहीं बल्कि आम आदमी के संकट में उसके साथ खड़ी पुलिस है!





