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संविधान बदलने के लिए साधारण बहुमत क्यों नहीं? समझिए संसद का नियम

किसी पार्टी को चुनाव में बहुमत मिलना उसे सरकार बनाने का अधिकार देता है। सरकार इसके बाद संसद में विधेयक ला सकती है, नीतियां बना सकती है और कानूनों में बदलाव कर सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर तरह के बदलाव के लिए वही सामान्य बहुमत पर्याप्त होगा।

भारतीय व्यवस्था में कुछ फैसलों को सामान्य कानून से अलग माना गया है। संविधान में संशोधन ऐसा ही एक मामला है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 368 में विशेष प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

यानी संसद में किसी प्रस्ताव के पक्ष में विरोध से ज्यादा वोट आ जाना अपने आप में संविधान संशोधन के लिए पर्याप्त नहीं होता।

साधारण बहुमत और विशेष बहुमत में अंतर

संसद में ज्यादातर सामान्य विधेयक साधारण बहुमत से पारित किए जा सकते हैं। इसका मतलब है कि मतदान में उपस्थित और वोट देने वाले सदस्यों में पक्ष में पड़े वोट विपक्ष में पड़े वोटों से अधिक हों।

लेकिन संविधान संशोधन विधेयकों के लिए नियम अलग है। ऐसे विधेयक को प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत की जरूरत होती है।

इसके लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं। पहली, सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में होना चाहिए। दूसरी, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन मिलना चाहिए।

कुछ संवैधानिक बदलावों के लिए संसद की मंजूरी के साथ कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की पुष्टि भी आवश्यक होती है।

ऐसा नियम क्यों बनाया गया?

संविधान देश का सामान्य कानून नहीं है। यह वह मूल दस्तावेज है जिसके आधार पर सरकार, संसद, न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों की व्यवस्था चलती है।

अगर संविधान में बदलाव केवल मामूली बहुमत से आसानी से किया जा सके, तो हर सरकार अपने राजनीतिक बहुमत के आधार पर देश के मूल नियमों में बड़े बदलाव कर सकती है।

विशेष बहुमत की व्यवस्था इस संभावना को सीमित करती है। इसका उद्देश्य यह है कि संविधान में महत्वपूर्ण परिवर्तन के लिए संसद में अपेक्षाकृत व्यापक सहमति मौजूद हो।

संसद सिर्फ कानून पास करने की जगह नहीं

संसद की भूमिका केवल विधेयकों पर मतदान तक सीमित नहीं है। संसद में सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, मंत्री जवाब देते हैं और विभिन्न संसदीय समितियां विधेयकों तथा सरकारी कामकाज की जांच करती हैं।

लोकसभा में सीधे चुने हुए प्रतिनिधि आते हैं, जबकि राज्यसभा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है। इस तरह दोनों सदन मिलकर देश की विधायी व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं।

प्रश्नकाल, चर्चा, बहस और संसदीय समितियां सरकार को जवाबदेह बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

लोकसभा की सीटें बढ़ाने का सवाल इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

लोकसभा की सीटों की संख्या और उनका राज्यों के बीच वितरण केवल संख्या का विषय नहीं है। इसका संबंध संसद में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व से है।

भारत में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन संविधान और संबंधित कानूनों के तहत होता है। जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करने का सवाल लंबे समय से राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय रहा है।

विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों में यह चिंता सामने आती रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व पर भविष्य के परिसीमन का क्या प्रभाव पड़ेगा।

दूसरी ओर, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में आबादी का महत्व होना चाहिए।

महिलाओं के आरक्षण से भी जुड़ा है परिसीमन

महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है।

हालांकि इसका कार्यान्वयन परिसीमन और संबंधित जनगणना प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इसलिए महिला आरक्षण, जनगणना और परिसीमन के मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं।

यही कारण है कि लोकसभा सीटों के संभावित पुनर्विन्यास का प्रश्न केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रहता। इसका असर राज्यों के प्रतिनिधित्व और भविष्य के राजनीतिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।

संविधान खुद बदलाव की प्रक्रिया को कठिन बनाता है

संविधान निर्माताओं ने न तो संविधान को पूरी तरह अपरिवर्तनीय बनाया और न ही उसमें बदलाव को सामान्य कानून जितना आसान रखा।

यह बीच का रास्ता है। जरूरत पड़ने पर संविधान में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया और पर्याप्त संसदीय सहमति जरूरी है।

यही व्यवस्था संविधान को समय के साथ बदलने की गुंजाइश देती है और साथ ही उसके मूल ढांचे को जल्दबाजी या सीमित बहुमत के आधार पर बदलने से सुरक्षा भी प्रदान करती है।

बहुमत से ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रक्रिया

किसी विधेयक के पक्ष में ज्यादा वोट मिलना और संविधान संशोधन के लिए जरूरी बहुमत हासिल करना दो अलग बातें हैं।

सामान्य कानून के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त हो सकता है, लेकिन संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत की संवैधानिक शर्त पूरी करनी पड़ती है।

इसका मूल उद्देश्य यही है कि देश के सबसे महत्वपूर्ण नियमों में बदलाव केवल तत्काल राजनीतिक बहुमत के आधार पर न हो, बल्कि उसके लिए संसद में व्यापक समर्थन जुटे।

सरकार का चुनाव जीतना उसे शासन करने का जनादेश देता है, लेकिन संविधान में बदलाव के लिए भारतीय व्यवस्था अतिरिक्त सहमति की मांग करती है। साधारण और विशेष बहुमत के बीच यही अंतर संसदीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। संविधान को बदलने की शक्ति संसद के पास है, लेकिन उस शक्ति के इस्तेमाल के लिए संविधान ने स्पष्ट प्रक्रिया और व्यापक समर्थन की शर्त तय की है।

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