दिल्ली में रोज 6,131 टन कचरा सीधे लैंडफिल में, DPCC रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

दिल्ली में आबादी और कचरे का बोझ लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उसके निस्तारण की व्यवस्था पीछे छूटती दिखाई दे रही है। DPCC के आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी में रोजाना पैदा होने वाला करीब 44 फीसदी कचरा बिना प्रोसेसिंग के लैंडफिल में पहुंच रहा है। ऐसे में सवाल है कि कूड़े के पहाड़ आखिर कब कम होंगे?
दिल्ली में रोज निकल रहा 13,862 टन कचरा
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) की रिपोर्ट के अनुसार, राजधानी में प्रतिदिन करीब 13,862 टन कचरा पैदा हो रहा है। इसमें से 7,741 टन यानी लगभग 55.84 फीसदी कचरे का ही प्रसंस्करण हो पा रहा है। बाकी 6,131 टन कचरा बिना प्रोसेसिंग के सीधे लैंडफिल स्थलों पर डाला जा रहा है।
यह स्थिति ओखला, भलस्वा और गाजीपुर के कूड़े के पहाड़ों पर दबाव बढ़ा रही है। रिपोर्ट में पिछले साल की समान अवधि में प्रतिदिन 11,842 टन कचरा पैदा होने और 4,534 टन कचरे के बिना प्रसंस्करण रह जाने का आंकड़ा दिया गया है। यानी अब हर दिन अतिरिक्त कचरे का बोझ भी लैंडफिल पर पड़ रहा है।
सूखे और गीले कचरे का बड़ा हिस्सा
दिल्ली नगर निगम (MCD) के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी में लगभग 8,100 टन सूखा कचरा और 5,400 टन गीला कचरा प्रतिदिन निकलता है। सूखे कचरे में प्लास्टिक, कागज और दूसरी ऐसी सामग्री शामिल होती है, जिसे छंटाई के बाद दोबारा इस्तेमाल या रिसाइकिल किया जा सकता है। वहीं, गीले कचरे से खाद और बायोगैस तैयार करने की संभावना रहती है।
अगर घरों, बाजारों और संस्थानों में कचरे को अलग-अलग रखने की व्यवस्था प्रभावी हो, तो उसका निस्तारण आसान हो सकता है। इसके लिए नागरिकों की भागीदारी के साथ पर्याप्त प्रसंस्करण सुविधाएं भी जरूरी हैं।
वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांटों पर बढ़ता दबाव
दिल्ली में कचरे से बिजली बनाने के लिए चार वेस्ट-टू-एनर्जी (WTE) प्लांट संचालित होने की जानकारी दी गई है। इनकी कुल क्षमता 6,550 टन प्रतिदिन बताई गई है। हालांकि, संयंत्रों की क्षमता और वास्तविक संचालन में अंतर होने पर कचरे का बैकलॉग बढ़ सकता है।
गाजीपुर स्थित WTE प्लांट के बार-बार खराब होने की समस्या पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने भी चिंता जताई है। दूसरी ओर, ओखला का 200 टन प्रतिदिन क्षमता वाला कंपोस्टिंग प्लांट कई वर्षों से बंद बताया गया है। इसे बायो-CNG संयंत्र में बदलने की परियोजना में देरी भी कचरा प्रबंधन की चुनौतियों को बढ़ाती है।
2028 तक नई क्षमता जोड़ने की योजना
दिल्ली नगर निगम का दावा है कि दिसंबर 2028 तक प्रतिदिन 8,150 टन की अतिरिक्त कचरा प्रसंस्करण क्षमता विकसित की जाएगी। इसके लिए नरेला-बवाना, तेहखंड, ओखला और गाजीपुर में नए संयंत्र स्थापित करने तथा मौजूदा सुविधाओं का विस्तार करने की योजना है।
दिल्ली मास्टर प्लान 2047 के अनुमान के मुताबिक, भविष्य में राजधानी में रोजाना कचरे की मात्रा 25,000 टन तक पहुंच सकती है। इसलिए नई परियोजनाओं को समय पर पूरा करना और मौजूदा संयंत्रों को नियमित रूप से चलाना बेहद जरूरी होगा।
कचरे के पहाड़ घटाने के लिए क्या जरूरी?
दिल्ली में कचरे की समस्या का समाधान केवल नए प्लांट बनाने से नहीं होगा। घरों से गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग इकट्ठा करना, प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग बढ़ाना, गीले कचरे से खाद बनाना और पुराने लैंडफिल स्थलों का वैज्ञानिक तरीके से उपचार करना भी जरूरी है।
सबसे बड़ी चुनौती योजनाओं को जमीन पर उतारने की है। यदि कचरे का उत्पादन इसी तरह बढ़ता रहा और प्रसंस्करण क्षमता समय पर नहीं बढ़ी, तो लैंडफिल पर दबाव और गंभीर हो सकता है। दिल्ली को स्वच्छ बनाने के लिए अब घोषणाओं से आगे बढ़कर नियमित निगरानी, जवाबदेही और प्रभावी कचरा प्रबंधन की जरूरत है।





