बकरियों से भरा वाहन पकड़ना पड़ा भारी! गश्त पर निकले उपनिरीक्षक को ही करनी पड़ी कार्रवाई, महिला CSP के रवैये पर उठे सवाल क्या गश्ती पुलिस अब थानों का काम भी करेगी?

रीवा। रीवा जिले में रात्रि गश्त के दौरान बकरियों से भरे एक वाहन को पकड़ने की घटना अब पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बन गई है। चर्चा केवल वाहन पकड़े जाने की नहीं बल्कि उसके बाद हुए घटनाक्रम की है जिसने पुलिस व्यवस्था और कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार रात्रि गश्त में लगे एक उपनिरीक्षक और पुलिस टीम ने संदिग्ध परिस्थितियों में बकरियों से भरे एक वाहन को पकड़ा। बताया जा रहा है कि वाहन तेज गति से चल रहा था और उसे रोकने के लिए पुलिस टीम को विशेष प्रयास करना पड़ा। वाहन पकड़े जाने के बाद उसे आगे की वैधानिक कार्रवाई के लिए संबंधित थाना क्षेत्र में ले जाया गया। सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में गश्ती दल संदिग्ध वाहन को पकड़कर संबंधित थाना क्षेत्र को सुपुर्द कर देता है जिसके बाद स्थानीय थाना पुलिस प्रकरण दर्ज कर आवश्यक कार्रवाई करती है। लेकिन इस मामले में घटनाक्रम कुछ अलग ही दिशा में जाता दिखाई दिया।
जब पकड़कर लाए हो तो कार्रवाई भी खुद करो
सूत्रों के अनुसार वाहन पकड़े जाने के बाद संबंधित उपनिरीक्षक को कथित तौर पर यह कहा गया कि जब वाहन पकड़कर लाए हो तो उसकी कार्रवाई भी स्वयं ही करो। चर्चा है कि यह निर्देश उस समय दिया गया जब उपनिरीक्षक रात्रि गश्त की ड्यूटी पर था और उसका प्राथमिक दायित्व क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाए रखना तथा संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना था। बताया जा रहा है कि परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उपनिरीक्षक को मजबूरी में स्वयं ही कार्रवाई की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी। इस घटनाक्रम ने पुलिस विभाग के भीतर भी कई सवालों को जन्म दे दिया है।
क्या यही है गश्ती व्यवस्था का उद्देश्य?
पुलिस विभाग में वर्षों से यह व्यवस्था चली आ रही है कि गश्ती दल अपराध या संदिग्ध गतिविधि का पता लगाकर संबंधित थाना क्षेत्र को सूचना देता है और आरोपी वाहन अथवा जब्त सामग्री को संबंधित थाने के सुपुर्द करता है। इसके बाद विवेचना और कानूनी कार्रवाई का दायित्व संबंधित थाना संभालता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि गश्त में लगे अधिकारी और जवानों को ही हर मामले में पूरी कार्रवाई करने के लिए बाध्य किया जाएगा तो वे क्षेत्र में गश्त और अपराध नियंत्रण की जिम्मेदारी कैसे निभाएंगे?
पद के प्रभाव का आरोप या प्रशासनिक व्यवस्था?
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कुछ लोग इसे प्रशासनिक निर्णय बता रहे हैं जबकि कुछ इसे पद के प्रभाव का उपयोग कर अधीनस्थ अधिकारियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी डालने का मामला मान रहे हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इतना जरूर है कि घटना के बाद पुलिसकर्मियों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि यदि गश्त के दौरान जोखिम उठाकर संदिग्ध वाहन पकड़ने के बाद भी उन्हें अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ेगा तो भविष्य में ऐसी कार्रवाई के प्रति उनका उत्साह प्रभावित हो सकता है।
मनोबल पर पड़ सकता है असर
जानकारों का मानना है कि कानून व्यवस्था की पहली कड़ी गश्ती दल ही होता है। यदि गश्त में लगे अधिकारी और जवान संदिग्ध गतिविधियों पर कार्रवाई करने के बजाय अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ और जवाबदेही के डर से बचने लगें तो इसका सीधा असर अपराध नियंत्रण व्यवस्था पर पड़ सकता है। यही कारण है कि अब यह मामला केवल बकरियों से भरे एक वाहन तक सीमित नहीं रह गया है। चर्चा इस बात की भी हो रही है कि आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों बनीं जिनमें गश्त कर रहे उपनिरीक्षक को ही पूरी कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
पहले भी लग चुके हैं आरोप
क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि संबंधित CSP पर पूर्व में चोरहटा क्षेत्र में संदिग्ध वाहनों को रोकने कथित प्रबंधन करने और बाद में छोड़ने जैसे आरोप लगाए जा चुके हैं। हालांकि इन आरोपों की किसी आधिकारिक जांच में पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठते सवाल विभाग की छवि को प्रभावित कर रहे हैं।





