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NGO और धार्मिक संस्थाओं पर FCRA Amendment Bill 2026 का असर क्या होगा, क्वात्रा ने मिथक और हकीकत से समझाया

विदेशी फंडिंग को लेकर प्रस्तावित FCRA Amendment Bill 2026 ने भारत में नई बहस छेड़ दी है। क्या यह NGO और धार्मिक संगठनों पर शिकंजा कसने वाला कानून है, या विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश? सरकार की ओर से सामने आए स्पष्टीकरण इन सवालों का जवाब देते हैं।

अफवाहों के बीच सामने आया स्पष्टीकरण

भारत सरकार के प्रस्तावित Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill 2026 को लेकर सोशल मीडिया और सिविल सोसाइटी के बीच कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ संगठनों ने इसके संभावित प्रभावों पर चिंता जताई है। इसी बीच अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बिल से जुड़े कथित मिथकों और वास्तविकता को सामने रखा।

भारत अकेला देश नहीं

सरकार की ओर से दिए गए तर्क के मुताबिक, विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला कानून सिर्फ भारत में ही नहीं है। अमेरिका में FARA और FATCA जैसे कानून हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन भी विदेशी वित्तीय गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं लागू कर चुके हैं। ऐसे में प्रस्तावित बदलाव को वैश्विक नियामक व्यवस्था के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

क्या किसी धर्म को निशाना बनाया जाएगा?

बिल को लेकर सबसे संवेदनशील सवाल धार्मिक संगठनों से जुड़ा है। सरकार का पक्ष है कि FCRA सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों के रखरखाव और चैरिटी जैसी गतिविधियां नियमों के दायरे में विदेशी फंडिंग के लिए पात्र बनी रह सकती हैं। यानी उद्देश्य किसी एक समुदाय को अलग से निशाना बनाना नहीं बताया गया है।

NGO की संपत्ति जब्त होने का सवाल

एक बड़ी आशंका यह है कि नए प्रावधानों से विदेशी फंड लेने वाले NGO की संपत्ति पर खतरा पैदा हो सकता है। सरकार के स्पष्टीकरण के अनुसार, पंजीकरण रद्द होने की स्थिति में विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों को लेकर पहले से कानूनी व्यवस्था मौजूद है। प्रस्तावित बदलावों में ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए स्पष्ट प्रक्रिया तय करने की बात कही गई है।

विदेशी फंडिंग में वास्तव में बढ़ोतरी

सरकार के आंकड़ों के अनुसार, FCRA के तहत पंजीकृत संगठनों को मिलने वाला विदेशी योगदान 2010-11 में करीब 1.2 अरब डॉलर था, जो 2024-25 में बढ़कर 2.67 अरब डॉलर हो गया। भारत में लाखों NGO हैं, लेकिन FCRA पंजीकरण रखने वाले संगठनों की संख्या करीब 14,450 बताई गई है।

असली मुद्दा पारदर्शिता और जवाबदेही

FCRA का मूल उद्देश्य विदेशी धन को रोकना नहीं, बल्कि उसके स्रोत और इस्तेमाल को नियंत्रित करना है। संगठन को पंजीकरण, निर्धारित प्रक्रिया और फंड के उपयोग की रिपोर्टिंग जैसी शर्तों का पालन करना होता है। सरकार का तर्क है कि नया संशोधन इसी व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर गवर्नेंस लाने की दिशा में कदम है।

FCRA Amendment Bill 2026 पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता की जरूरत है, तो दूसरी तरफ सामाजिक संगठनों की स्वतंत्रता और उनके कामकाज को लेकर चिंताएं भी महत्वपूर्ण हैं। आखिरकार, किसी भी नए कानून की असली कसौटी यही होगी कि वह पारदर्शिता बढ़ाए, लेकिन वैध सामाजिक और मानवीय कामों की राह अनावश्यक रूप से न रोके।

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