5 पर गिरी गाज… फिर भी कल्पना की मौत का राज बरकरार!निलंबन-तबादले से क्या दब जाएंगे बड़े सवाल? 9 महीने का इलाज किसने किया, 25 की रात SGMH में क्या हुआ और 26 की रात ऑपरेशन की नौबत क्यों आई?

रीवा। कल्पना मिश्रा और उसके नवजात बच्चे की मौत पर आखिरकार सरकार ने कार्रवाई कर दी। डॉ. सोनल अग्रवाल, डॉ. निधि पांडेय और दो स्टाफ नर्स निलंबित, अस्पताल अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा पद से पृथक और डॉ. सुनील अग्रवाल का रीवा से सतना तबादला कार्रवाई की लंबी सूची सामने है। लेकिन क्या यही इस दर्दनाक कहानी का अंत है?
नहीं! असली सवाल तो अब शुरू होते हैं।
क्योंकि कल्पना की मौत को लेकर जिस बिंदु पर सबसे ज्यादा जांच की जरूरत है, वह सिर्फ SGMH की आखिरी कुछ घंटों की कहानी नहीं बल्कि उसके पूरे 9 महीने के इलाज की कहानी है। अगर कल्पना का गर्भावस्था के दौरान करीब नौ महीने इलाज चला, तो उसकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री कहां है? इलाज किस डॉक्टर ने किया? क्या गर्भावस्था सामान्य थी या हाई-रिस्क? क्या किसी जांच में खतरे के संकेत सामने आए थे? परिवार को समय रहते संभावित जटिलताओं की जानकारी दी गई थी या नहीं? और सबसे बड़ा सवाल अगर स्थिति गंभीर थी तो कल्पना को SGMH अंतिम समय में ही क्यों लाया गया? यही वह कड़ी है जिसकी निष्पक्ष जांच इस पूरे मामले की दिशा बदल सकती है।
25 से 26 तारीख की रात आखिर हुआ क्या?
कल्पना को 25 तारीख को अस्पताल लाया गया। इसके बाद हालत बिगड़ती गई और 26 की रात ऑपरेशन की स्थिति बनी। इसी दौरान परिवार अस्पताल में मौजूद था और मदद के लिए इधर-उधर भटकता रहा ऐसा परिजनों का आरोप है। 26 की रात कल्पना की मौत की खबर के बाद उसके चाचा धर्मेन्द्र मिश्रा अस्पताल पहुंचे। धर्मेन्द्र के मुताबिक उन्होंने अपने पुराने परिचित डॉ. राहुल मिश्रा से संपर्क किया। उनका कहना है कि राहुल मिश्रा अस्पताल पहुंचे और मेडिसिन, एनेस्थीसिया तथा गायनेकोलॉजी विभाग के डॉक्टरों से संपर्क करने का प्रयास किया।
लेकिन इसी दौरान अस्पताल में परिजनों और स्टाफ के बीच विवाद की स्थिति भी बनी। नर्स के व्यवहार को लेकर परिवार ने आपत्ति जताई और मामला अस्पताल की चारदीवारी से निकलकर थाने तक पहुंच गया।
अस्पताल से अमहिया थाना फिर सड़क पर उतरा मामला
धर्मेन्द्र मिश्रा ने मामले को सिर्फ अस्पताल में शिकायत तक सीमित नहीं रखा। वह कल्पना के पिता रामसिरोमणि मिश्रा और अन्य परिजनों के साथ अमहिया थाने पहुंचे और लिखित आवेदन दिया। इसके बाद गांव और रिश्तेदारों के लोग जुटे। मामला धीरे-धीरे जनआक्रोश में बदला और फिर राजनीति भी इसमें प्रवेश कर गई। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेताओं के प्रदर्शन के बीच धर्मेन्द्र मिश्रा को खुद अपील करनी पड़ी कि कल्पना की न्याय की लड़ाई को राजनीतिक अखाड़ा न बनाया जाए।
सबसे बड़ा ट्विस्ट जिस डॉक्टर पर सवाल, उसी के पक्ष में चाचा!
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू अब सामने आया है। डॉ. राहुल मिश्रा को पद से पृथक किए जाने के बाद खुद धर्मेन्द्र मिश्रा उनके पक्ष में सफाई दे रहे हैं। धर्मेन्द्र का कहना है कि राहुल मिश्रा ने परिवार से एक रुपया भी नहीं मांगा। उनके अनुसार डॉक्टर परिवार की मदद और सांत्वना के लिए पहुंचे थे और उनके बयान के एक हिस्से को काटकर सोशल मीडिया पर अलग संदर्भ में वायरल किया गया।
यह बयान अपने आप में कई सवाल खड़े करता है क्या वायरल वीडियो पूरी कहानी बता रहा था? क्या जांच में वीडियो की पूरी रिकॉर्डिंग देखी गई? और क्या कार्रवाई से पहले सभी पक्षों की बात पूरी तरह सुनी गई?
पिता का दर्द सिर्फ तबादला नहीं, चाहिए पूरी सच्चाई
एक तरफ कार्रवाई की फाइलें बंद करने की तैयारी हो सकती है दूसरी तरफ बेटी और नवजात को खो चुके रामसिरोमणि मिश्रा का सवाल अभी बाकी है। उनका दर्द सीधा है बेटी चली गई, बच्चा चला गया अब सिर्फ निलंबन और तबादले से न्याय कैसे मिलेगा? कल्पना केस में अब जांच का दायरा अस्पताल की आखिरी रात तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। नौ महीने के उपचार से लेकर SGMH में भर्ती, मेडिकल रिपोर्ट, ऑपरेशन, उपचार और मौत तक की पूरी मेडिकल टाइमलाइन सामने लानी होगी।
अब सवाल सरकार से नहीं, पूरी व्यवस्था से है
•कल्पना को SGMH देर से क्यों लाया गया?
•नौ महीने के इलाज की जिम्मेदारी किसकी थी?
•क्या मेडिकल हिस्ट्री की पूरी जानकारी अस्पताल को थी?
•25 और 26 तारीख के बीच उपचार में क्या-क्या हुआ?
•ऑपरेशन की स्थिति क्यों बनी?
•मौत के वास्तविक कारण की वैज्ञानिक जांच हुई या नहीं?
•और क्या कार्रवाई के घेरे में कोई निर्दोष भी आ गया?
इन सवालों के जवाब बिना पूरी मेडिकल टाइमलाइन और स्वतंत्र जांच के सामने नहीं आ सकते।
कार्रवाई जरूरी है, लेकिन कार्रवाई ही न्याय नहीं है।
कल्पना को असली न्याय तब मिलेगा जब मौत की पूरी कड़ी खुलेगी, वास्तविक जिम्मेदार सामने आएंगे और दोषी तथा निर्दोष के बीच साफ अंतर किया जाएगा। अब देखना यह है 5 पर गिरी गाज के बाद जांच यहीं रुकती है या फिर उन सवालों तक पहुंचेगी, जिनके जवाब में कल्पना की मौत का असली सच छिपा है।





