दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता नहीं रहे, प्रशासनिक सुधारों में उनके योगदान की कहानी हमेशा याद रहेगी

पूर्व दिल्ली मुख्य सचिव और 1975 बैच के रिटायर्ड IAS अधिकारी राकेश मेहता के निधन की खबर से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में शोक है। 75 वर्षीय मेहता नोएडा में रहते थे। उनकी मौत ने उनके लंबे प्रशासनिक जीवन के साथ-साथ सेवानिवृत्ति के बाद के अकेलेपन और व्यक्तिगत संघर्षों पर भी चर्चा छेड़ दी है।
सेंट स्टीफंस से IAS तक का सफर
देहरादून से ताल्लुक रखने वाले राकेश मेहता की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज से हुई। इसके बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से MSc किया। 1975 में उनका चयन IAS में हुआ और उन्हें AGMUT कैडर मिला। यहीं से दिल्ली प्रशासन में उनकी लंबी पारी शुरू हुई।
शीला दीक्षित के भरोसेमंद अधिकारी
मेहता ने दिल्ली सरकार और नगर निगम में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। 2007 से 2010 तक दिल्ली के मुख्य सचिव रहते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के साथ उन्होंने कई प्रशासनिक सुधारों को आगे बढ़ाया। उन्हें ऐसा अधिकारी माना जाता था जो फैसलों को फाइलों में अटकाने के बजाय जमीन पर लागू कराने पर जोर देते थे।
बसों से बिजली तक बड़े सुधार
दिल्ली में ब्लू लाइन बसों की जगह लो-फ्लोर बसों की व्यवस्था, बिजली क्षेत्र में सुधार और MCD में यूनिट एरिया सिस्टम जैसे फैसलों में मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। पर्यावरण सुधार के लिए एयर एंबियंस फंड की स्थापना से भी उनका नाम जुड़ा रहा। इन पहलों ने राजधानी के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित किया।
कॉमनवेल्थ गेम्स में अहम जिम्मेदारी
2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली में बुनियादी ढांचे को लेकर कई चुनौतियां थीं। मुख्य सचिव के रूप में मेहता ने फ्लाइओवर, मेट्रो विस्तार और स्टेडियम से जुड़े कामों की निगरानी की। उनके साथ काम कर चुके अधिकारियों के अनुसार, वह तेज निर्णय और समयबद्ध क्रियान्वयन के पक्षधर थे।
रिटायरमेंट के बाद बदली जिंदगी
नवंबर 2010 में सेवानिवृत्त होने के बाद मेहता कुछ समय परिवार के साथ रहे। बाद के वर्षों में उन्होंने नोएडा में अलग रहना पसंद किया, जबकि पत्नी और बेटा देहरादून में रहते थे और उनसे मिलने आते रहते थे। उनके परिवार के सदस्य भी प्रशासन और शिक्षा से जुड़े रहे हैं।
एक मौत, कई सवाल
परिवार के अनुसार, मेहता स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और मानसिक तनाव से जूझ रहे थे। पुलिस को उनके आवास से एक नोट भी मिला, जिसमें उन्होंने अपनी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया। उनकी मृत्यु ने एक बड़ा सवाल पीछे छोड़ा है—क्या दशकों तक दूसरों के लिए फैसले लेने वाला एक मजबूत प्रशासक अपने निजी संघर्षों में खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहा था?
राकेश मेहता की पहचान केवल एक पूर्व मुख्य सचिव की नहीं थी। दिल्ली के प्रशासनिक बदलावों में उनकी भूमिका लंबे समय तक याद की जाएगी। उनकी कहानी यह भी याद दिलाती है कि उपलब्धियों से भरा जीवन भी निजी संघर्षों से अछूता नहीं होता। ऐसे समय में परिवार, दोस्तों और समाज का साथ शायद किसी भी पद और प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।





