वन नेशन-वन इलेक्शन पर शिवराज का बड़ा बयान, 2029 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने की चर्चा

वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर केंद्र की कोशिशें अब तेज होती दिख रही हैं। हरिद्वार में शिवराज सिंह चौहान के समर्थन से लेकर JPC की बैठक तक, 2029 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने की चर्चा ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है।
शिवराज सिंह चौहान ने बताया विकास के लिए जरूरी
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हरिद्वार में संत समाज की बैठक के दौरान वन नेशन-वन इलेक्शन का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले चुनाव विकास और जनसेवा की रफ्तार को प्रभावित करते हैं।
शिवराज के मुताबिक चुनावों में बार-बार समय, पैसा और प्रशासनिक संसाधन खर्च होते हैं। उन्होंने संत समुदाय से इस संवैधानिक सुधार को लेकर लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की अपील की। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी इस पहल के प्रति समर्थन जताया।
2029 में साथ चुनाव कराने की चर्चा
वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर सबसे बड़ी चर्चा अब 2029 को लेकर है। सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक सरकार 2034 के बजाय 2029 में ही लोकसभा के साथ कई राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने की संभावना पर विचार कर रही है।
हालांकि, इसे लागू करने के लिए संवैधानिक संशोधन और अलग-अलग राज्यों के विधानसभा कार्यकाल में बदलाव जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।
22 राज्यों के चुनाव का दावा
चर्चा के मुताबिक 2029 में लोकसभा के साथ 22 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने की संभावना है। इनमें फिलहाल 16 राज्यों में NDA और छह राज्यों में विपक्षी गठबंधन की सरकार होने की बात कही जा रही है।
अगर 2029 में चुनाव एक साथ कराने हैं तो 2027 में चुनाव वाले उत्तर प्रदेश, गोवा, गुजरात, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे राज्यों का कार्यकाल पहले खत्म करना होगा।
कई राज्यों में चार साल पहले चुनाव की चुनौती
2028 में चुनाव होने वाले कर्नाटक, तेलंगाना, मेघालय, नागालैंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और त्रिपुरा में भी इसी तरह कार्यकाल में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है।
यही वजह है कि वन नेशन-वन इलेक्शन केवल चुनाव की तारीख एक करने का मामला नहीं है। इसके लिए राज्यों की मौजूदा राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था में बड़े स्तर पर समायोजन करना पड़ेगा।
आजादी के बाद पहले भी साथ हुए चुनाव
एक साथ चुनाव भारत के लिए पूरी तरह नया विचार नहीं है। आजादी के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव लगभग एक साथ हुए थे।
बाद में कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग होने और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण चुनावों का चक्र अलग-अलग हो गया। इसके बाद देश में लगातार अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।
JPC में भी जारी है मंथन
इसी बीच वन नेशन-वन इलेक्शन से जुड़े विधेयकों पर बनी संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC की बैठक भी जारी है। बैठक में प्रियंका गांधी, पी. चिदंबरम, रणदीप सिंह सुरजेवाला और सुप्रिया सुले समेत कई नेता शामिल हुए।
JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी ने बैठक से पहले कहा कि अगर इच्छाशक्ति हो तो सब कुछ संभव है। उनका कहना है कि उद्देश्य सिर्फ चुनावों की संख्या कम करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।
2029 का फैसला कितना आसान होगा?
वन नेशन-वन इलेक्शन के समर्थक इसे चुनावी खर्च, प्रशासनिक दबाव और बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से राहत का रास्ता मानते हैं। वहीं विपक्ष राज्यों के अधिकार, सरकार गिरने की स्थिति और विधानसभा का कार्यकाल समय से पहले खत्म करने जैसे सवाल उठा रहा है।
इसलिए 2029 में एक साथ चुनाव की चर्चा भले तेज हो गई हो, लेकिन इसे जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा। असली परीक्षा राजनीतिक सहमति और संवैधानिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की होगी।





