
रीवा। संजय गांधी अस्पताल में कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत ने चिकित्सा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला अब केवल कथित चिकित्सकीय लापरवाही तक सीमित नहीं है बल्कि विभागीय जांच और जिम्मेदारी तय करने की पूरी व्यवस्था पर ही गंभीर सवाल उठने लगे हैं। प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में ड्यूटी पर तैनात रहीं डॉ.सोनल अग्रवाल के निलंबन के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि उनके विरुद्ध पहले भी विभागीय जांच हो चुकी थी। यदि ऐसा है तो सवाल सीधा है पहली जांच में क्या हुआ था? किसने जांच की थी? और कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
दूसरी जांच में निलंबन, तो पहली जांच का नतीजा क्या था?
वर्तमान मामले में जारी निलंबन आदेश में प्रथम दृष्टया कार्य के प्रति घोर लापरवाही और गंभीर अनुशासनहीनता का उल्लेख किए जाने की बात सामने आई है। इसी के बाद अस्पताल के भीतर और बाहर सवाल उठने लगे हैं कि जब पहले भी विभागीय स्तर पर जांच की बात सामने आ रही है तो उस समय जिम्मेदारी किसकी तय हुई थी?
यदि पहली जांच में कोई गंभीर तथ्य सामने आया था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कोई गलती नहीं मिली थी तो अब दूसरी जांच में इतने गंभीर आरोपों के आधार पर निलंबन की स्थिति क्यों बनी? पुरानी जांच की फाइल अब इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी बन गई है।
करुणा भरी पुकार..मैं नहीं बचूंगी… बचा लीजिए ने झकझोर दिया
बैकुंठपुर के हटवा निवासी कल्पना मिश्रा पहली बार मां बनने वाली थीं। प्रसव के लिए उन्हें संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उपचार के दौरान उनकी हालत बिगड़ती गई और 26 अगस्त की रात 11 बजकर 55 मिनट पर उनकी मौत हो गई। इसके साथ ही उनके नवजात की भी जान चली गई। मौत से कुछ घंटे पहले का एक वीडियो सामने आया है। इसमें कल्पना अस्पताल से बाहर निकलकर अपने परिजन से मदद मांगती दिखाई देती हैं। वीडियो में उनके द्वारा मैं नहीं बचूंगी… बचा लीजिए कहे जाने की बात सामने आई है।
इस दृश्य ने अस्पताल की व्यवस्था और मरीज की समय पर देखभाल को लेकर उठ रहे सवालों को और गंभीर बना दिया है।
मौत से पहले परिजनों ने लगाई थी गुहार
मृतका के पिता रामशरण मिश्रा और अन्य परिजनों का आरोप है कि उन्होंने कल्पना की बिगड़ती हालत को देखते हुए डॉक्टरों से तत्काल देखने और उपचार की मांग की थी। परिजनों का दावा है कि उनकी शिकायतों पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई।परिजनों ने डॉ. सोनल अग्रवाल सहित संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की। अमहिया थाने में आवेदन दिए जाने की बात भी सामने आई है। महिला और नवजात की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल के मुख्य द्वार पर प्रदर्शन कर अपना आक्रोश जताया।
पहली जांच की फाइल सार्वजनिक करने की मांग
अब मृतका के परिजन और लोग पूछ रहे हैं पहली विभागीय जांच का निष्कर्ष क्या था? जांच किस अधिकारी ने की? किन बिंदुओं पर जांच हुई? क्या किसी की जिम्मेदारी तय हुई? यदि जिम्मेदारी तय हुई तो कार्रवाई क्या हुई? और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो उसका कारण क्या था?
परिजनों का आरोप है कि पहली जांच के दौरान डॉ. सोनल अग्रवाल को राहत मिल गई थी। हालांकि, इस दावे की पुष्टि संबंधित विभागीय अभिलेख और आधिकारिक दस्तावेज सामने आने के बाद ही हो सकेगी।
सवालों के घेरे में अस्पताल प्रशासन भी
पूरे घटनाक्रम में अस्पताल प्रशासन और अधिष्ठाता की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि किसी चिकित्सक के विरुद्ध पहले विभागीय जांच हो चुकी थी तो उसके बाद प्रशासन ने क्या कदम उठाए? क्या कार्यप्रणाली पर निगरानी बढ़ाई गई? क्या शिकायतों को गंभीरता से लिया गया?कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत ने संजय गांधी अस्पताल की व्यवस्था के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब असली परीक्षा दूसरी विभागीय जांच की है।
क्या इस बार दोषियों की जिम्मेदारी तय होगी?क्या पहली जांच की फाइल सामने आएगी?क्या अस्पताल प्रशासन की भी जवाबदेही तय होगी? या फिर एक और मौत, एक और जांच और अंत में वही पुरानी खामोशी?





