सज्जन कुमार की शोक सभा पर बीजेपी में घमासान, तीन सांसदों के श्रद्धांजलि देने पर उठे सवाल

सज्जन कुमार की शोक सभा ने एक बार फिर 1984 के सिख-विरोधी दंगों की राजनीतिक विरासत को चर्चा में ला दिया है। कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी के बाद बीजेपी ने सवाल उठाए थे, लेकिन अब अपने ही तीन सांसदों के शोक जताने को लेकर पार्टी के भीतर नाराजगी सामने आई है।
तालकटोरा स्टेडियम में हुई शोक सभा
दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में शनिवार, 29 अगस्त को पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार के लिए शोक सभा आयोजित की गई। परिवार के अनुसार, इसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए। दिल्ली और आसपास के राज्यों के नेताओं के अलावा सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी सभा में पहुंचकर श्रद्धांजलि दी।
बीजेपी के तीन सांसदों पर सवाल
सज्जन कुमार के निधन के बाद बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा पार्टी के तीन सांसदों को लेकर नाराजगी जताए जाने की बात सामने आई है। पार्टी सूत्र के मुताबिक, कमलजीत सहरावत, रामवीर सिंह बिधूड़ी और योगेंद्र चंदोलिया कुमार के आवास पर जाकर शोक व्यक्त करने पहुंचे थे। इसी को लेकर पार्टी नेतृत्व ने आपत्ति जताई।
एचएस फूलका ने की कार्रवाई की मांग
बीजेपी नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील एचएस फूलका ने पार्टी अध्यक्ष के रुख की सराहना की। उन्होंने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के मुद्दे पर बीजेपी के लंबे राजनीतिक संघर्ष का हवाला दिया। फूलका ने तीनों सांसदों के कुमार के घर जाने की निंदा करते हुए उनके बहिष्कार की मांग भी की।
1984 दंगों से जुड़ा रहा नाम
सज्जन कुमार का नाम 1984 के सिख-विरोधी दंगों के मामलों के कारण दशकों से विवादों में रहा। दिल्ली हाई कोर्ट ने दिसंबर 2018 में उन्हें पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोषी ठहराए जाने के बाद उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था।
एक और मामले में मिली थी उम्रकैद
फरवरी 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने दो सिखों की हत्या से जुड़े एक अन्य मामले में भी सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें 20 अगस्त को तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल लाया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।
श्रद्धांजलि और राजनीति का सवाल
सज्जन कुमार की मौत के बाद सामने आया यह विवाद केवल एक शोक सभा तक सीमित नहीं है। यह उस संवेदनशील इतिहास की ओर भी ध्यान खींचता है, जिसे लेकर भारतीय राजनीति में आज भी तीखी बहस होती है। सवाल यही है कि राजनीतिक विरोध के बीच व्यक्तिगत संवेदना की सीमा कहां तय होनी चाहिए। यही बहस आने वाले दिनों में इस मामले को और गर्म कर सकती है।





