ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले चीखती रही महिल,मुझे बचा लो, ये लोग मुझे मार डालेंगे; मौत के बाद निलंबन से नहीं थमे सवाल, SGMH की ऑन-ड्यूटी व्यवस्था कटघरे में

रीवा। संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) में प्रसव के दौरान महिला और नवजात की मौत का मामला लगातार गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। परिजनों के अनुसार महिला को प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था और भर्ती के बाद उसकी रिपोर्ट सामान्य बताई गई थी। परिजन डॉक्टरों से बार-बार महिला की स्थिति को लेकर जानकारी लेते रहे लेकिन उन्हें कथित तौर पर यही आश्वासन दिया गया कि घबराने की कोई बात नहीं है और मां-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।
बताया जा रहा है कि घटना से पहले तक परिजनों को किसी बड़े खतरे की जानकारी नहीं दी गई। लेकिन रात करीब आठ बजे जब महिला को ऑपरेशन थिएटर की ओर ले जाया गया तभी घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरे मामले को सवालों के घेरे में ला दिया। परिजनों के मुताबिक महिला ऑपरेशन थिएटर की ओर जाते समय जोर-जोर से चिल्लाती हुई नजर आई और मदद की गुहार लगाती रही। इस घटनाक्रम से जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। वीडियो में महिला की चीख-पुकार ने अस्पताल की व्यवस्थाओं और उपचार प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुझे बचा लो…आखिर महिला इतनी घबराई क्यों थी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस महिला को कुछ समय पहले तक परिजनों के सामने सामान्य स्थिति में बताया जा रहा था वह ऑपरेशन थिएटर के समय इतनी भयभीत क्यों नजर आई? क्या उस समय उसकी स्थिति में अचानक कोई गंभीर बदलाव आया था? यदि आया था तो परिजनों को इसकी जानकारी कब और किस डॉक्टर ने दी? और यदि महिला की हालत गंभीर थी तो उसे लेकर तत्काल क्या चिकित्सकीय कदम उठाए गए? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकते हैं।
ऑन-ड्यूटी डॉक्टर की भूमिका पर भी सवाल
मामले में ऑन-ड्यूटी व्यवस्था भी चर्चा के केंद्र में है। डॉक्टर राहुल मिश्रा से जब ऑन-ड्यूटी डॉक्टर की भूमिका और उनकी मौजूदगी के संबंध में जानकारी चाही गई तो उनके वक्तव्यों के अनुसार ऑन-ड्यूटी डॉक्टर का मुख्य कार्य मॉनिटरिंग करना है और आवश्यकता पड़ने पर कंसल्टेंट को बुलाया जाता है। यहीं से एक बड़ा सवाल सामने आता है यदि प्रसव जैसी संवेदनशील स्थिति में ऑन-ड्यूटी डॉक्टर हर समय मौजूद नहीं रहतीं और जरूरत पड़ने पर ही बुलाया जाना है तो मरीज की स्थिति बिगड़ने का आकलन कौन करेगा? मरीज को चिकित्सकीय आपातस्थिति में जरूरत बताकर डॉक्टर के आने का इंतजार करना कितना सुरक्षित है? क्या चिकित्सा आपातकाल पहले सूचना देकर आता है?
परिजनों ने सोनल अग्रवाल सहित अन्य डॉक्टरों पर लगाए आरोप
मृतका के परिजनों ने ऑन-ड्यूटी तैनात डॉक्टरों जिनमें सोनल अग्रवाल सहित अन्य नाम शामिल बताए जा रहे हैं पर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बिना नहीं की जा सकती। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और उस दौरान मौजूद चिकित्सकीय रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, ऑपरेशन थिएटर रिकॉर्ड, मॉनिटरिंग चार्ट तथा सीसीटीवी फुटेज की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
मौत के बाद निलंबन, लेकिन असली सवाल अब भी कायम
घटना के बाद अस्पताल परिसर के बाहर परिजनों के बैठने और कार्रवाई की मांग के बीच पहले दो नर्सों के निलंबन की कार्रवाई की गई। इसके बाद सोनल अग्रवाल और निधि पांडे को भी निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई। कार्रवाई जरूर हुई लेकिन क्या निलंबन मात्र से पूरे मामले की जवाबदेही तय हो जाएगी?
असल सवाल यह है कि जिस समय महिला को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया उस समय उसकी निगरानी किसके जिम्मे थी? उपचार का निर्णय किस स्तर पर लिया गया? वरिष्ठ चिकित्सक कब मौजूद थे? और महिला की हालत बिगड़ने के बाद उसे बचाने के लिए समय रहते क्या-क्या प्रयास किए गए?
सरकारी अस्पताल की ड्यूटी या निजी अस्पताल में व्यस्तता?
मामले ने एक और संवेदनशील मुद्दे को सामने ला दिया है सरकारी चिकित्सकों की ड्यूटी और निजी अस्पतालों में उनकी कथित व्यस्तता। यदि कोई सरकारी चिकित्सक सरकारी अस्पताल में ऑन-ड्यूटी है तो उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी उस समय अस्पताल में भर्ती मरीजों की देखभाल और आपातस्थिति में उपलब्ध रहना होना चाहिए। यदि यह आरोप सही है कि कुछ डॉक्टर सरकारी ड्यूटी के दौरान भी निजी अस्पतालों में अधिक समय देते हैं तो इसकी उच्चस्तरीय जांच आवश्यक है। क्या सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की ड्यूटी केवल कागजों पर दर्ज है या वास्तव में मरीजों के बीच उनकी उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है?
जरूरत पड़ने पर डॉक्टर आएंगी क्या मौत भी जरूरत देखकर आएगी?
यह पूरा मामला अस्पताल प्रशासन के सामने सबसे कठिन सवाल खड़ा करता है। मरीज की हालत कब बिगड़ेगी यह कोई पहले से तय नहीं कर सकता। ऐसे में ऑन-ड्यूटी चिकित्सक की भूमिका केवल जरूरत पड़ने पर बुलाए जाने तक सीमित है तो आपातस्थिति में तत्काल चिकित्सकीय निर्णय कौन लेगा?
क्या हादसा पहले सूचना देकर आता है? क्या मरीज की जान जाने के बाद यह तय किया जाएगा कि डॉक्टर की जरूरत थी? SGMH जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में मरीज और उनके परिजनों का भरोसा इसी बात पर टिका होता है कि संकट की घड़ी में चिकित्सकीय टीम तत्काल उपलब्ध होगी।
जांच से ही सामने आएगा लापरवाही, सिस्टम की खामी या चिकित्सकीय जटिलता?
महिला और नवजात की मौत के मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आना चाहिए। यह भी संभव है कि चिकित्सकीय जटिलता के कारण स्थिति बिगड़ी हो लेकिन यदि परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों में सच्चाई है तो जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही जरूरी है।
जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि महिला की भर्ती से लेकर ऑपरेशन थिएटर तक कौन-कौन से चिकित्सकीय निर्णय लिए गए कौन डॉक्टर ड्यूटी पर था कौन मौके पर मौजूद था कब वरिष्ठ चिकित्सक को बुलाया गया, महिला की स्थिति कब बिगड़ी और उसे बचाने के लिए क्या तत्काल उपचार किया गया।
क्योंकि सवाल केवल एक मौत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जहां मरीज अपने जीवन का भरोसा सरकारी अस्पताल और वहां तैनात चिकित्सकों पर छोड़ता है। अगर ड्यूटी के समय डॉक्टर की मौजूदगी ही सवाल बन जाए तो फिर मरीज आखिर किसके भरोसे अस्पताल पहुंचे?





