रीवा की कागजी फोरलेन का काला सच: 19 किमी में बिखरती नालियां, लोहे की जगह प्लास्टिक सरीया KCC कंपनी पर बड़ा भ्रष्टाचार!

रीवा। रतहरा से चोरहटा तक बन रही फोरलेन सड़क अब विकास की नहीं बल्कि अव्यवस्था, लापरवाही और कथित भ्रष्टाचार की पहचान बन चुकी है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हो रही इस परियोजना में गुणवत्ता की अनदेखी इतनी गंभीर है कि करीब 19 किलोमीटर लंबी ड्रेनेज (नालियां) पूरी होने से पहले ही दम तोड़ने लगी हैं। कहीं पैदल चलने से नाली टूट रही है कहीं साइकिल गुजरने से दरारें पड़ रही हैं तो कहीं भारी वाहन गुजरते ही कंक्रीट बिखर जा रहा है।
जमीनी हालात बताते हैं कि यह सड़क मजबूती पर नहीं बल्कि कागजी गुणवत्ता पर खड़ी की गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण का लगभग 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है लेकिन मजबूती और टिकाऊपन का कहीं नामोनिशान नहीं है। सड़क किनारे बनी नालियां जगह-जगह धंस रही हैं जिससे साफ जाहिर होता है कि निर्माण में मूलभूत तकनीकी मानकों की अनदेखी की गई।
सबसे चौंकाने वाला और गंभीर आरोप यह है कि नालियों के निर्माण में लोहे की सरीया की जगह प्लास्टिक सरीया का इस्तेमाल किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार नालियों और कंक्रीट स्ट्रक्चर में प्लास्टिक सरीया का उपयोग मजबूती के लिहाज से बेहद जोखिम भरा होता है। स्थानीय लोगों ने शुरुआत में ही इसका विरोध किया था, लेकिन उनकी आवाज को नजरअंदाज कर दिया गया। अब यही लापरवाही नालियों के टूटने और दरकने की बड़ी वजह बनती दिख रही है।
इसके साथ ही कई स्थानों पर रिटेनिंग वॉल (सहारा देने वाली दीवार) में भी लोहे की सरीया नहीं डाली गई। सीधे कंक्रीट डालकर दीवार खड़ी कर दी गई, जो अब समय के साथ दरकने लगी है। यह न केवल तकनीकी चूक है बल्कि निर्माण की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
निर्माण प्रक्रिया में भी भारी लापरवाही सामने आई है। कंक्रीट डालने के बाद जरूरी क्योरिंग (पानी का छिड़काव) नहीं किया गया जिससे सीमेंट की मजबूती विकसित ही नहीं हो पाई। वहीं वाइब्रेटर और वाटर कंपेक्शन जैसी अहम प्रक्रियाएं भी नजरअंदाज कर दी गईं। नतीजा यह है कि थोड़े से दबाव में ही नालियां और दीवारें टूटने लगी हैं।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि निर्माण एजेंसी KCC कंपनी ने लागत बचाने के नाम पर गुणवत्ता से समझौता किया। वहीं इस पूरे प्रोजेक्ट की निगरानी कर रही सरकारी एजेंसी की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। लोगों का कहना है कि अधिकारियों ने जमीनी निरीक्षण करने के बजाय केवल कागजों में काम पूरा दिखाया और असलियत पर ध्यान नहीं दिया। प्रसेंटेज सेटिंग जैसे आरोप भी चर्चा में हैं।
इस घटिया निर्माण ने आम लोगों में गुस्सा भर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सड़क और नालियां इतनी कमजोर हैं कि पैदल चलने से टूट जाए तो भारी ट्रैफिक के दौरान क्या हाल होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कई लोग इसे मौत की फोरलेन करार दे रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इस पूरे मामले की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या केवल निर्माण कंपनी पर कार्रवाई होगी या फिर निगरानी करने वाली एजेंसी भी जांच के दायरे में आएगी? जनता अब खुलकर उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रही है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहती है।
फिलहाल रीवा की यह 19 किलोमीटर लंबी सड़क पूरी होने से पहले ही भ्रष्टाचार और लापरवाही का प्रतीक बन चुकी है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो यह सड़क आने वाले दिनों में बड़े हादसों का कारण बन सकती है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन जागता है या फिर यह मामला भी कागजों में दफन हो जाता है।





