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बीहर पुल खुला, लेकिन KCC ने इटौरा को बना दिया जाम का चौराहा! डायवर्जन के पैसे बचाने की कीमत जनता चुका रही? 19 किलोमीटर में रेंग रही जिंदगी, एम्बुलेंस तक हुई बेबस

रीवा। बीहर नदी पुल पर शुक्रवार सुबह से वाहनों की आवाजाही शुरू होते ही लोगों को उम्मीद थी कि करीब दो महीने से चली आ रही यातायात की परेशानी खत्म हो जाएगी। लेकिन राहत की यह उम्मीद जल्द ही निराशा में बदल गई। पुल खुलने के कुछ ही घंटों बाद इटौरा क्षेत्र में ऐसा जाम लगा कि पूरा इलाका वाहनों के समुद्र में तब्दील हो गया। सड़क पर फंसे लोगों के बीच एक ही सवाल गूंजता रहा क्या फोरलेन निर्माण में लगी KCC कंपनी को जनता की परेशानी दिखाई नहीं दे रही या फिर डायवर्जन और यातायात व्यवस्था पर खर्च होने वाले पैसे बचाने के लिए लोगों को जाम में झोंका जा रहा है?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि रतहरा से चोरहटा तक लगभग 19 किलोमीटर लंबे निर्माण क्षेत्र में ट्रैफिक प्रबंधन पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। कहीं अधूरी सड़क, कहीं उखड़ी हुई सतह, कहीं निर्माण सामग्री का अंबार और कहीं संकरे रास्ते। नतीजा यह कि सुबह से लेकर देर शाम तक वाहन रेंगते रहे और हजारों लोग सड़क पर फंसकर रह गए।

सबसे चिंताजनक तस्वीर तब सामने आई जब जाम में एम्बुलेंस वाहन और अन्य आपातकालीन सेवाओं से जुड़े वाहन भी घंटों फंसे रहे। मरीजों को लेकर निकल रही एम्बुलेंसें सायरन बजाती रहीं लेकिन वाहनों की लंबी कतारों के बीच रास्ता नहीं मिल सका। लोगों का कहना है कि यदि किसी मरीज की जान चली जाती तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? प्रशासन, निर्माण एजेंसी या फिर वह व्यवस्था जिसने समय रहते ट्रैफिक प्लान ही तैयार नहीं किया?

क्षेत्रवासियों का आरोप है कि करोड़ों रुपये की परियोजना पर काम कर रही कंपनी निर्माण की गुणवत्ता और यातायात व्यवस्था दोनों को लेकर सवालों के घेरे में है। जहां एक ओर सड़क निर्माण की रफ्तार अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखाई दे रही वहीं दूसरी ओर सुरक्षित और सुगम डायवर्जन मार्ग तैयार करने में भी गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। लोगों का कहना है कि यदि वैकल्पिक मार्गों को व्यवस्थित किया जाता और ट्रैफिक नियंत्रण के लिए पर्याप्त संसाधन लगाए जाते तो इटौरा को इस तरह जाम की गिरफ्त में नहीं आना पड़ता।

विडंबना यह है कि जिस फोरलेन परियोजना को लोगों की सुविधा और तेज आवागमन के लिए बनाया जा रहा है वही परियोजना आज लोगों की परेशानी का कारण बनती दिखाई दे रही है। व्यापारियों का कारोबार प्रभावित हो रहा है  लोग समय पर  नहीं पहुंच पा रहे घंटों सड़क पर समय गंवाना पड़ रहा है। अब सवाल केवल जाम का नहीं बल्कि जवाबदेही का है। क्या निर्माण एजेंसी के अधिकारियों ने कभी स्वयं इस मार्ग से गुजरकर लोगों की परेशानी देखी है? क्या करोड़ों रुपये की परियोजना में ट्रैफिक प्रबंधन जैसी मूलभूत व्यवस्था की कोई कीमत नहीं है? और आखिर कब तक जनता धूल, जाम और अव्यवस्था का दंश झेलती रहेगी?

बीहर पुल खुलने के बाद शहर को राहत मिलने की उम्मीद थी लेकिन इटौरा का जाम यह बता रहा है कि समस्या पुल नहीं, बल्कि निर्माण कार्यों के दौरान अपनाई जा रही कार्यशैली है। यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे तो यह जाम केवल असुविधा नहीं बल्कि किसी बड़े हादसे का कारण भी बन सकता है। अब निगाहें प्रशासन पर हैं कि वह जनता को राहत देता है या फिर सब कुछ कंपनी के भरोसे छोड़ देता है।

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