अथर्व ब्लड सेंटर का खेल या सिस्टम की मिलीभगत? SGMH में किसके आदेश पर पहुंचता रहा ब्लड, किसके इशारे पर चलता रहा पूरा सिलसिला?

रीवा। कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत के मामले में अथर्व ब्लड सेंटर पर हुई कार्रवाई ने अब सिर्फ एक यूनिट रक्त की आपूर्ति का सवाल नहीं छोड़ा है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 16 सितंबर को मध्यप्रदेश खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने अथर्व ब्लड सेंटर की कथित अनियमितताओं को लेकर आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। इसी मामले में रीवा के औषधि निरीक्षक राधेश्याम बट्टी को निलंबित किया गया है।
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि यदि अथर्व ब्लड सेंटर की गतिविधियां 3 जुलाई 2026 से बंद रखने के निर्देश दिए गए थे, तो इसके बाद वहां से रक्त कैसे जारी हुआ और वह रक्त SGMH तक किस प्रक्रिया के तहत पहुंचा? एक स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार जुलाई में कमी पूरी होने तक सेंटर की गतिविधियां तत्काल प्रभाव से बंद रखने के निर्देश जारी हुए थे। बाद में कथित रूप से चोरी-छिपे संचालन और रक्त वितरण की जानकारी पर सेंटर को सील किया गया तथा रिकॉर्ड जब्त किए गए।
यही वह बिंदु है जहां अब जांच का दायरा केवल अथर्व ब्लड सेंटर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। SGMH में बाहर से रक्त मंगाने की अनुमति किसने दी? रक्त की मांग किस विभाग या अधिकारी ने भेजी? अथर्व से यूनिट किसके आदेश पर जारी हुई? अस्पताल में रक्त प्राप्त करने और मरीज को चढ़ाने की पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन अधिकारी और कर्मचारी शामिल थे?
कल्पना मिश्रा के मामले में सामने आई कार्रवाई के बाद ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सरकारी अस्पताल में रक्त की आपूर्ति कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। प्रत्येक यूनिट के स्रोत, जांच, क्रॉस-मैच, इश्यू और ट्रांसफ्यूजन का रिकॉर्ड होना चाहिए। ऐसे में प्रशासन यदि पुराने दस्तावेजों का मिलान कराए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि बंद रखने के निर्देश के दौरान अथर्व से कितनी यूनिट रक्त जारी हुईं और वे किन मरीजों तक पहुंचीं।
अब खुले पुराने रिकॉर्ड का राज!
जांच एजेंसियों को अथर्व ब्लड सेंटर का स्टॉक रजिस्टर, ब्लड इश्यू रजिस्टर, डोनर रिकॉर्ड, क्रॉस-मैच रिपोर्ट, मरीजों की मांग-पर्चियां, बिल, भुगतान विवरण और SGMH से संबंधित प्राप्ति रिकॉर्ड जब्त कर उनका मिलान करना चाहिए। सवाल सीधा है कल्पना से पहले कितने मरीजों को अथर्व का रक्त मिला?
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि बंद रखने के आदेश के बाद सेंटर से यदि कोई रक्त जारी हुआ तो उसकी जानकारी संबंधित विभाग को थी या नहीं। यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई और यदि जानकारी नहीं थी तो निगरानी व्यवस्था कहां थी?
किसकी मेहरबानी से चलता रहा कारोबार?
यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि अथर्व ब्लड सेंटर के कारण पहले कितने मरीजों की मौत हुई या कितने लोग प्रभावित हुए। ऐसी बात केवल दस्तावेजी जांच और चिकित्सकीय निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि यदि लाइसेंस संबंधी प्रतिबंध लागू थे, तो रक्त की आपूर्ति का रास्ता कैसे खुला रहा?
16 सितंबर की कार्रवाई में स्वयं प्रशासन ने अथर्व ब्लड सेंटर के खिलाफ आपराधिक प्रकरण की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। अब जरूरत है कि जांच केवल कल्पना मिश्रा के मामले तक सीमित न रहे। अथर्व के पुराने रिकॉर्ड से लेकर SGMH के ब्लड इश्यू रिकॉर्ड तक पूरा मिलान हो। तभी सामने आएगा कि नियमों की अनदेखी केवल एक मामले तक सीमित थी या लंबे समय से व्यवस्था में कहीं गंभीर चूक चल रही थी।





