
रीवा। संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) में व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे चिकित्सा तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जिस मरीज को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया उसे शव की तरह परिजनों को सौंप दिया गया और मर्चुरी तक पहुंचा दिया गया। लेकिन पोस्टमार्टम की नौबत आने से पहले ही ऐसा राज खुला, जिसने सभी को हैरान कर दिया जिसे अस्पताल ने मृत बता दिया था वह मरीज जिंदा था। यह मामला सीधी निवासी गिरजा प्रसाद गुप्ता पिता बुद्धिराम गुप्ता उम्र करीब 66 वर्ष से जुड़ा बताया जा रहा है। मरीज को 4 सितंबर की रात करीब 11:25 बजे SGMH में भर्ती कराया गया था।
डॉक्टर ने मृत बताया, परिजन से शव की रिसीविंग भी करा ली!
मिली जानकारी के मुताबिक गिरजा प्रसाद गुप्ता को जनरल मेडिसिन विभाग की चौथी मंजिल के 4-B सेक्शन में बेड नंबर 33 पर भर्ती किया गया था। एडमिशन डॉक्टर के रूप में डॉ. अनुराग चौरसिया का नाम सामने आया है। इसके बाद कथित तौर पर मरीज को मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल की प्रक्रिया के तहत मरीज को शव बताते हुए परिजनों के हवाले किया गया। इतना ही नहीं शव प्राप्त करने की रिसीविंग परिजनों से लिखवाए जाने की बात भी सामने आई है।
मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि रिसीविंग पर्ची पर डॉ. निवेश सविता के हस्ताक्षर और सील होने की जानकारी सामने आई है। यानी कागजों में मरीज मृत हो चुका था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
मर्चुरी पहुंचा शव, फिर जिंदा निकला मरीज!
मरीज को मर्चुरी भेजे जाने के बाद परिजन पोस्टमार्टम की तैयारी में जुट गए। इसी दौरान पता चला कि जिस व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया गया था वह जीवित है।
इसके बाद मरीज को मर्चुरी से वापस लाकर वार्ड में भर्ती कराया गया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसी स्थिति पैदा कैसे हुई? क्या मरीज की मृत्यु घोषित करने से पहले पर्याप्त चिकित्सकीय जांच की गई थी? क्या मृत्यु की पुष्टि के लिए जरूरी मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन हुआ था? यदि मरीज जीवित था तो उसे मृत घोषित करने वाला कौन था और जिम्मेदारी किसकी है?
चमत्कार या मेडिकल सिस्टम की सबसे बड़ी चूक?
इस घटना को कोई चमत्कार कह रहा है तो कोई इसे अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल मान रहा है। सबसे भयावह पहलू यह है कि यदि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया समय रहते शुरू हो जाती तो स्थिति कितनी गंभीर हो सकती थी इसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। गनीमत यह रही कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया तत्काल आगे नहीं बढ़ सकी और मरीज के जीवित होने की जानकारी सामने आ गई।
कल्पना मिश्रा मामले के बाद नया मामला, SGMH फिर सवालों में
SGMH में कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत का मामला अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ है। परिवार और विभिन्न पक्षों की ओर से अस्पताल की व्यवस्थाओं एवं चिकित्सकीय जिम्मेदारी को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच जिंदा मरीज को मृत घोषित किए जाने का मामला सामने आना अस्पताल प्रशासन के लिए एक नई चुनौती बन गया है। अब सवाल सिर्फ एक मरीज का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जहां एक तरफ मौत के मामलों में जांच की मांग उठ रही है और दूसरी तरफ जिंदा मरीज को ही मृत घोषित किए जाने का आरोप सामने आ रहा है।
अब जिम्मेदारी तय होगी या मामला भी फाइलों में दब जाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि मरीज की मृत्यु किस आधार पर घोषित की गई, किस डॉक्टर ने पुष्टि की, शव मर्चुरी तक कैसे पहुंचा रिसीविंग क्यों ली गई और बाद में मरीज जीवित कैसे पाया गया।
रीवा के SGMH में अब सबसे बड़ा सवाल यही है आखिर मरीज की जिंदगी और मौत तय करने की प्रक्रिया इतनी कमजोर कैसे हो गई कि जिंदा इंसान को ही शव बना दिया गया?





