MP हाईकोर्ट ने नए राज्यपाल की नियुक्ति वाली याचिका खारिज की, अनुच्छेद 156(3) का दिया हवाला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नए राज्यपाल की नियुक्ति की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में मौजूदा राज्यपाल का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद नए राज्यपाल की नियुक्ति और तब तक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल का प्रभार देने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि संविधान राज्यपाल के पद पर संवैधानिक शून्य की स्थिति की अनुमति नहीं देता।
क्या थी याचिका में मांग?
जबलपुर के जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. एम.ए. खान ने यह जनहित याचिका दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि मध्य प्रदेश के मौजूदा राज्यपाल का पांच साल का कार्यकाल 7 जुलाई 2026 को समाप्त हो गया है।
याचिकाकर्ता ने केंद्र से नए राज्यपाल की नियुक्ति के लिए निर्देश देने की मांग की थी। साथ ही, नए राज्यपाल के पदभार संभालने तक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल का कार्यभार सौंपने का अनुरोध भी किया गया था।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 156(3) का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल अपने उत्तराधिकारी के पदभार संभालने तक पद पर बने रह सकते हैं।
अदालत के मुताबिक, यह संवैधानिक प्रावधान इसलिए है ताकि राज्यपाल के पद पर किसी तरह का ‘संवैधानिक शून्य’ पैदा न हो। इसी आधार पर कोर्ट ने नए राज्यपाल की तत्काल नियुक्ति को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कृष्ण बल्लभ सहाय बनाम जांच आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1969 के फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले के संदर्भ में अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 156(3) राज्यपाल को तब तक पद पर बने रहने की अनुमति देता है, जब तक उत्तराधिकारी पदभार ग्रहण नहीं कर लेता।
इस व्याख्या के आधार पर पीठ ने माना कि केवल पांच साल की अवधि पूरी हो जाने से राज्यपाल का पद स्वतः रिक्त नहीं हो जाता।
याचिकाकर्ता ने राज्यपाल के पद का महत्व बताया था
याचिका में राज्यपाल के संवैधानिक महत्व का भी उल्लेख किया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में भी भूमिका निभाते हैं और राज्य सरकार से जुड़े कुछ मामलों में संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाते हैं।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया था कि कार्यकाल पूरा होने की जानकारी होने के बावजूद नए राज्यपाल की नियुक्ति के लिए कदम क्यों नहीं उठाए गए।
जनहित याचिका की पात्रता पर भी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की जनहित याचिका दाखिल करने की पात्रता से जुड़े पहलू पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट नियम, 2008 के अध्याय 10, नियम 27 के तहत आवश्यक ‘जन-उत्साही नागरिक’ के रूप में अपनी साख का खुलासा नहीं किया था।
अदालत ने यह भी कहा कि राज्यपाल की नियुक्ति में देरी से संविधान के अनुसार कार्य न किए जाने का सवाल उठ सकता है, लेकिन मौजूदा याचिका में अदालत को हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं मिला।
केंद्र की ओर से कौन पेश हुआ?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील जैन और डिप्टी सॉलिसिटर जनरल एस.एम. गुरु पेश हुए। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने पक्ष रखा। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय शंकर रैजादा और अभिमन्यु सिंह उपस्थित हुए।





