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भोपाल में 26 टन गौमांस केस में बड़ा ट्विस्ट: असलम चमड़ा NSA से बरी, हाईकोर्ट कमेटी के आदेश पर जेल से रिहा पुलिस की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

मुकेश पाण्डेय भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में चर्चित 26 टन कथित गौमांस तस्करी मामले में बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। इस हाई-प्रोफाइल केस के मुख्य आरोपी असलम कुरैशी उर्फ चमड़ को जेल से रिहा कर दिया गया है। रिहाई का आदेश मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की विशेष समीक्षा कमेटी द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) यानी रासुका की कार्रवाई को निरस्त करने के बाद जारी हुआ। सोमवार देर शाम असलम भोपाल सेंट्रल जेल से बाहर आ गया जिससे पूरे मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला 17 दिसंबर 2025 का है, जब नगर निगम के स्लॉटर हाउस से निकले एक संदिग्ध कंटेनर को पुलिस ने पकड़ा था। जांच में कंटेनर से करीब 26 टन मांस बरामद हुआ। पुलिस ने सैंपल को जांच के लिए मथुरा फॉरेंसिक लैब भेजा जहां रिपोर्ट में इसे गौमांस बताया गया। इसके बाद 8 जनवरी को पुलिस ने मुख्य आरोपी असलम कुरैशी और कंटेनर चालक मोहम्मद शोएब को गिरफ्तार कर लिया था। इस कार्रवाई के बाद मामला पूरे प्रदेश में सुर्खियों में आ गया।

जमानत के बाद फिर गिरफ्तारी
मामले में सुनवाई के दौरान 18 मार्च को एडीजे पंकज कुमार जैन की अदालत ने असलम को 35 हजार रुपए के मुचलके पर जमानत दे दी थी। लेकिन जेल से बाहर निकलते ही पुलिस ने उसे फिर हिरासत में ले लिया। गांधीनगर थाना पुलिस ने धारा 151 के तहत कार्रवाई करते हुए आरोप लगाया कि असलम क्षेत्र में शांति व्यवस्था बिगाड़ने की साजिश रच रहा है। इसके आधार पर जहांगीराबाद थाना पुलिस की सिफारिश पर उस पर NSA (रासुका) लगा दिया गया।

हाईकोर्ट कमेटी का बड़ा फैसला
कानून के अनुसार NSA के तहत की गई कार्रवाई की समीक्षा हाईकोर्ट की विशेष कमेटी करती है। असलम के मामले में सुनवाई के दौरान कमेटी ने पुलिस के तर्कों को पर्याप्त नहीं माना। कमेटी ने स्पष्ट कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य और आरोप रासुका लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके बाद NSA की कार्रवाई को निरस्त कर दिया गया और असलम की रिहाई का रास्ता साफ हो गया।

सोमवार शाम जेल से बाहर आया आरोपी
कमेटी के आदेश के बाद सोमवार देर शाम रिहाई की प्रक्रिया पूरी की गई। असलम कुरैशी भोपाल सेंट्रल जेल से बाहर निकल आया। यह वही मामला है जिसने कुछ महीने पहले प्रदेश की कानून-व्यवस्था और गौतस्करी के मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा कर दिया था।

जनचर्चा में उठ रहे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब आम जनता और राजनीतिक गलियारों में कई सवाल उठ रहे हैं। क्या पुलिस की जांच में खामियां थीं? क्या साक्ष्य कमजोर थे या कानूनी प्रक्रिया में चूक हुई? या फिर यह मामला महज ओवरएक्शन का उदाहरण बनकर रह गया?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतने बड़े स्तर पर मांस की बरामदगी हुई और फॉरेंसिक रिपोर्ट भी सामने आई, तो फिर कोर्ट में मामला कमजोर कैसे पड़ गया? क्या जांच एजेंसियों ने पर्याप्त ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए या कानूनी रणनीति में कमी रह गई?

पुलिस की साख पर असर
इस फैसले ने मध्य प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि NSA जैसे सख्त कानून का इस्तेमाल बेहद सावधानी और मजबूत साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। अन्यथा, अदालत में कार्रवाई टिक नहीं पाती और इससे पुलिस की साख को नुकसान होता है।

आगे क्या?
फिलहाल असलम कुरैशी जेल से बाहर है लेकिन मूल आपराधिक मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में कोर्ट में इस केस की सुनवाई जारी रहेगी, जो यह तय करेगी कि आरोपी पर लगे अन्य आरोप कितने मजबूत हैं।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि सिर्फ बड़ी कार्रवाई करना ही काफी नहीं बल्कि उसे कानूनी कसौटी पर खरा उतारना भी उतना ही जरूरी है।

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