संसदीय समितियों की अध्यक्षता छिनने पर TMC नाराज, डेरेक ओब्रायन ने सभापति को लिखा खत

2026-27 के लिए संसदीय स्थायी समितियों के पुनर्गठन के बाद तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र सरकार और संसद की समिति व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं। TMC के राज्यसभा नेता डेरेक ओब्रायन ने राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन को पत्र लिखकर कहा कि राज्यसभा के अधिकार क्षेत्र में आने वाली आठ विभागवार स्थायी समितियों में से किसी एक की भी अध्यक्षता AITC को नहीं दी गई है। उन्होंने सवाल किया कि क्या संसद को ‘गहरे और अंधेरे चेंबर’ में बदला जा रहा है।
दो समिति अध्यक्ष पद TMC के हाथ से गए
संसदीय समितियों के नए पुनर्गठन में TMC को दो अहम अध्यक्ष पदों से हाथ धोना पड़ा है। वाणिज्य संबंधी संसदीय समिति की अध्यक्ष रही TMC सांसद डोला सेन की जगह BJP के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी को अध्यक्ष बनाया गया है।
वहीं रसायन और उर्वरक संबंधी समिति की अध्यक्षता पहले TMC सांसद कीर्ति आजाद के पास थी। अब इस समिति की अध्यक्षता काकोली घोष दस्तीदार को दी गई है, जो TMC से अलग हुए समूह से जुड़ी हैं।
डेरेक ओब्रायन ने उठाया प्रतिनिधित्व का सवाल
राज्यसभा सभापति को लिखे पत्र में डेरेक ओब्रायन ने कहा कि राज्यसभा में BJP सबसे बड़ी पार्टी है, कांग्रेस दूसरी और AITC तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। इसके बावजूद 2024-25 और 2025-26 में जिन समिति अध्यक्ष पदों पर TMC का प्रतिनिधित्व था, वे अब पार्टी के पास नहीं हैं।
उन्होंने दावा किया कि 2019 में भी TMC राज्यसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन उस समय उसे संसदीय समिति की अध्यक्षता नहीं मिली थी। ओब्रायन के मुताबिक बाद में इस व्यवस्था में सुधार हुआ था, लेकिन अब स्थिति फिर पुराने दौर जैसी हो गई है।
‘क्या संसद को गहरे और अंधेरे चेंबर में बदला जा रहा?’
डेरेक ओब्रायन ने अपने पत्र में समिति अध्यक्षों के बंटवारे को संसद की व्यापक कार्यप्रणाली से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि क्या संसद को एक ‘गहरे और अंधेरे चेंबर’ में बदला जा रहा है।
उन्होंने कहा कि संसदीय समितियां विधेयकों और सरकारी कामकाज की विस्तृत जांच के लिए महत्वपूर्ण मंच हैं। उनके अनुसार, समितियों की भूमिका और विपक्षी दलों के प्रतिनिधित्व को कमजोर करना संसदीय निगरानी से जुड़े सवाल खड़े करता है।
विधेयकों की समिति जांच को लेकर भी सवाल
ओब्रायन ने पत्र में संसदीय समितियों की भूमिका से जुड़े कुछ आंकड़ों का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि 2004-09 के बीच हर 10 में से करीब छह विधेयक जांच के लिए समितियों के पास भेजे जाते थे, जबकि 2019-24 के दौरान यह अनुपात घटकर करीब दो रह गया।
उन्होंने अध्यादेशों की संख्या और संसद के बैठने के दिनों को लेकर भी तुलना की। उनके पत्र के अनुसार, पहली लोकसभा में संसद औसतन 45 दिन बैठती थी, जबकि 2016-24 के दौरान 17वीं लोकसभा में यह औसत करीब 18 दिन रह गया।
इन आंकड़ों को ओब्रायन द्वारा पत्र में दिए गए उदाहरण के तौर पर देखा जाना चाहिए।
लोकसभा उपाध्यक्ष पद का भी जिक्र
TMC सांसद ने अपने पत्र में लोकसभा के उपाध्यक्ष पद का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह पद 2019 से खाली है और इसे भी संसद की संस्थागत कार्यप्रणाली से जुड़े उदाहरण के तौर पर देखा जाना चाहिए।
उनका तर्क है कि संसदीय संस्थाओं में विपक्ष को पर्याप्त भूमिका और प्रतिनिधित्व मिलना संसदीय लोकतंत्र की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पुनर्गठन में कई विपक्षी दलों को भी मिली अध्यक्षता
हालांकि, नए पुनर्गठन में केवल सत्तारूढ़ BJP के सांसदों को ही समितियों की अध्यक्षता नहीं मिली है। कांग्रेस के शशि थरूर विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं, जबकि चारणजीत सिंह चन्नी कृषि समिति और मुकुल वासनिक शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल समिति की अध्यक्षता संभाल रहे हैं।
DMK के तिरुचि शिवा को उद्योग समिति और कनिमोझी करुणानिधि को उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण समिति की अध्यक्षता मिली है। सपा के रामगोपाल यादव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण समिति के अध्यक्ष बने हैं।
TMC के सामने अब आगे की रणनीति
संसदीय समितियों के पुनर्गठन के बाद TMC ने अपने प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए हैं। डेरेक ओब्रायन ने सभापति से इस व्यवस्था पर स्पष्टीकरण की मांग की है।
वहीं, संसदीय समितियों के पुनर्गठन के बाद विभिन्न दलों के बीच अध्यक्ष पदों का वितरण एक बार फिर राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। TMC का कहना है कि राज्यसभा में पार्टी की संख्या और पूर्व में मिली जिम्मेदारियों को देखते हुए उसे कम से कम एक समिति की अध्यक्षता मिलनी चाहिए थी। यह पार्टी की राजनीतिक आपत्ति है, जिसे ओब्रायन ने अपने पत्र के जरिए सभापति के सामने रखा है।
संसदीय स्थायी समितियों के 2026-27 के पुनर्गठन के बाद TMC ने अपने प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाया है। डेरेक ओब्रायन ने राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन को पत्र लिखकर समिति अध्यक्ष पदों के बंटवारे के साथ संसद की कार्यप्रणाली और विधेयकों की समिति जांच पर भी सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, नए पुनर्गठन में कांग्रेस, DMK और सपा जैसे विपक्षी दलों को कई महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता मिली है।





