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संसद का मानसून सत्र: हंगामे में बहा लोकतंत्र,सांसदों की तनख्वाह पर क्यों न हो सवाल?

नई दिल्ली संसद का मानसून सत्र आखिरकार उसी तस्वीर के साथ खत्म हुआ, जिसका अंदेशा पूरे सत्र के दौरान दिखाई दे रहा था हंगामा, नारेबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और सदन की कार्यवाही में लगातार व्यवधान। 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र आज 13 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ समाप्त हो गया।

अब सवाल यह नहीं है कि सत्ता पक्ष सही था या विपक्ष, सवाल यह है कि देश की सर्वोच्च विधायी संस्था में जनता के करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद संसद का काम आखिर कितनी गंभीरता से हुआ?

आंकड़े खुद तस्वीर बयां कर रहे हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार इस सत्र में लोकसभा अपने निर्धारित समय के महज 15 प्रतिशत और राज्यसभा करीब 33 प्रतिशत समय ही काम कर सकी। लोकसभा में प्रश्नकाल भी निर्धारित समय का केवल करीब 1 प्रतिशत और राज्यसभा में 12 प्रतिशत ही चल पाया।यानी जिस संसद में देश की नीतियां बननी थीं, जनता के सवाल उठने थे और सरकार से जवाब मांगे जाने थे,वहां बहस से ज्यादा शोर सुनाई दिया।

विपक्ष का विरोध जायज, लेकिन संसद ठप करना कितना जायज?

विपक्ष लोकतंत्र की रीढ़ है। सरकार से सवाल पूछना, भ्रष्टाचार और नीतिगत फैसलों पर जवाब मांगना और जनता की आवाज सदन में उठाना विपक्ष का संवैधानिक और राजनीतिक दायित्व है। लेकिन विरोध और संसद को लगातार बाधित करने के बीच एक महीन लेकिन बेहद महत्वपूर्ण अंतर है।

विपक्ष का सवाल कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका जवाब संसद के भीतर बहस से निकलना चाहिए,सदन बंद करवाकर नहीं।

वहीं सत्ता पक्ष की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। बहुमत के दम पर सरकार अगर विपक्ष की आपत्तियों को केवल राजनीतिक ड्रामा बताकर खारिज कर देगी तो लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर होगी। सरकार को विपक्ष को पर्याप्त अवसर देना होगा और विपक्ष को भी उस अवसर का उपयोग बहस के लिए करना होगा।

बसे बड़ा सवाल वेतन-भत्तों का क्या?

जब संसद का कामकाज बाधित होता है तो सबसे ज्यादा चोट आम आदमी को लगती है। सांसदों को वेतन और विभिन्न भत्ते मिलते हैं, संसद भवन की व्यवस्था पर भारी सार्वजनिक धन खर्च होता है और हजारों कर्मचारी सदन चलाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं,फिर सवाल उठना स्वाभाविक है अगर सांसद काम ही नहीं कर पा रहे हैं तो उनकी जवाबदेही कैसे तय होगी?

यहां ‘नो वर्क, नो पे’ की मांग राजनीतिक नारे से आगे बढ़कर गंभीर सार्वजनिक बहस का विषय बन सकती है। लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सांसदों के वेतन में कटौती का फैसला खुद संसद और कानून के जरिए ही संभव होगा। अर्थात जिन सांसदों के वेतन-भत्तों पर सवाल उठ रहे हैं, उसी व्यवस्था को कानून बनाकर अपने ऊपर जवाबदेही लागू करनी होगी।

यही तो विडंबना है!

कानून बनाने की चाबी भी संसद के पास है और सांसदों की जवाबदेही तय करने का रास्ता भी संसद से ही होकर गुजरता है,क्या सभी दल इस मुद्दे पर ईमानदारी से बैठकर ऐसी व्यवस्था बनाने को तैयार होंगे, जिसमें सांसद की उपस्थिति, सदन में भागीदारी, प्रश्न पूछने,बहस में हिस्सा लेने और अनावश्यक व्यवधान पैदा करने जैसे मानकों को सार्वजनिक किया जाए?

12 विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कितनी हुई?

सरकार के अनुसार सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन सदन की उत्पादकता बेहद कम रही। एक रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही। यानी कानून बनाने का काम कुछ हद तक हुआ,लेकिन जिस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विधेयकों पर व्यापक चर्चा, विपक्ष के सुझाव और संसदीय जांच की जरूरत होती है, उसकी गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। यही वह जगह है जहां जनता को पूछना चाहिए, संसद केवल विधेयक पारित करने की मशीन है या बहस और जवाबदेही का सर्वोच्च मंच भी?

हंगामे की राजनीति बंद होनी चाहिए

हर सरकार को याद रखना होगा कि वह स्थायी नहीं है और हर विपक्ष को भी याद रखना होगा कि वह केवल विरोध के लिए संसद में नहीं भेजा गया है। आज जो सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकता है। आज जो विपक्ष में है, कल सत्ता में आ सकता है। इसलिए संसद किसी एक दल की नहीं,1.4 अरब से ज्यादा भारतीयों की संस्था है। अगर विपक्ष सरकार को घेरना चाहता है तो घेरिए लेकिन सवालों से अगर सरकार अपना पक्ष रखना चाहती है तो रखिए,लेकिन जवाबों के साथ,अगर विधेयक गलत है तो तर्क से रोकिए। अगर सरकार गलत है तो आंकड़ों और तथ्यों से कटघरे में खड़ा कीजिए।

लेकिन संसद को लगातार ठप कर देना लोकतांत्रिक हथियार का ऐसा इस्तेमाल है, जिसका नुकसान अंततः जनता को ही उठाना पड़ता है। अब समय आ गया है कि सांसदों के वेतन-भत्ते से ज्यादा उनकी जवाबदेही पर चर्चा हो,क्यों न संसद की उत्पादकता का सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड बने? क्यों न हर सांसद की उपस्थिति और संसदीय भागीदारी जनता के सामने हो? क्यों न अनावश्यक व्यवधान पर सभी दल मिलकर आचारसंहिता और जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था बनाएं?

क्योंकि लोकतंत्र में जनता सांसद को हंगामा करने के लिए नहीं,उसकी आवाज बनने के लिए चुनती है और अगर संसद में जनता की आवाज ही शोर में दब जाए,तो फिर सवाल सिर्फ विपक्ष से नहीं पूरे राजनीतिक तंत्र से पूछा जाना चाहिए।

संसद चलेगी तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।
सवाल होंगे तभी सरकार जवाब देगी।
बहस होगी तभी बेहतर कानून बनेंगे।
वरना अगली बार भी यही सवाल खड़ा होगा, सत्र खत्म हुआ या लोकतंत्र का समय बर्बाद हुआ?


मुकेश पाण्डेय भोपाल

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