9 करोड़ के इंजेक्शन के लिए जंग लड़ रही अनिका, हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा— क्या यह बच्ची भी लाडली नहीं?

एक दुर्लभ बीमारी और बड़ी चुनौती
डॉक्टरों के अनुसार, अनिका के इलाज के लिए एक विशेष इंजेक्शन की जरूरत है जिसकी कीमत लगभग 9 करोड़ रुपये है। यह रकम किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कल्पना से परे है। ऐसे में माता-पिता पिछले कई महीनों से अपनी बेटी की जिंदगी बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।
क्राउड फंडिंग बनी उम्मीद की किरण
अनिका के परिवार ने हार नहीं मानी। सोशल मीडिया, समाजसेवियों और आम लोगों की मदद से क्राउड फंडिंग अभियान शुरू किया गया। पिछले आठ महीनों में परिवार करीब 7 से 8 करोड़ रुपये जुटाने में सफल रहा है। हालांकि इलाज के लिए अभी भी लगभग 1 से 1.5 करोड़ रुपये की जरूरत है। यह राशि भले ही कुल खर्च के मुकाबले कम लगे, लेकिन परिवार के लिए यह अंतिम और सबसे कठिन चरण साबित हो रहा है।
वजन घटाने की मजबूरी, बचपन पर भारी बीमारी
इलाज की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। दिल्ली स्थित एम्स में इंजेक्शन लगाने से पहले अनिका का वजन 13 किलोग्राम से कम होना जरूरी है। इसी कारण परिवार उसे विशेष निगरानी में रख रहा है और कई दिनों से केवल तरल आहार दिया जा रहा है। एक तरफ बीमारी का दर्द है, दूसरी तरफ इलाज की शर्तें। मासूम अनिका का बचपन अस्पतालों और चिकित्सा प्रक्रियाओं के बीच सिमटता जा रहा है।
हाईकोर्ट की संवेदनशील टिप्पणी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान राज्य और केंद्र सरकार से महत्वपूर्ण सवाल पूछा— “क्या यह बच्ची भी प्रदेश की लाडली नहीं है?” अदालत ने सरकारों को निर्देश दिया कि वे आपसी समन्वय से इलाज के लिए अधिकतम सहायता उपलब्ध कराने का रास्ता निकालें। कोर्ट ने इस मामले में एम्स दिल्ली को भी पक्षकार बनाया और शीघ्र निर्णय लेने पर जोर दिया।
कल्याणकारी योजनाओं और मानवीय जिम्मेदारी का सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जब सरकार विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से लाखों लोगों को सहायता प्रदान कर सकती है, तो एक गंभीर बीमारी से जूझ रही बच्ची के जीवन रक्षक इलाज के लिए विशेष सहायता पर भी विचार किया जाना चाहिए।
यह मामला केवल एक परिवार की आर्थिक परेशानी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, दुर्लभ बीमारियों और सरकारी सहायता व्यवस्था पर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
अनिका शर्मा की कहानी सिर्फ एक बच्ची की बीमारी की कहानी नहीं है, बल्कि उम्मीद, संघर्ष और समाज की संवेदनशीलता की भी कहानी है। हाईकोर्ट की टिप्पणी ने यह याद दिलाया है कि किसी भी कल्याणकारी राज्य की असली पहचान उसके सबसे कमजोर नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी से होती है। अब निगाहें सरकारों पर हैं कि वे इस मासूम की जिंदगी बचाने के लिए कितनी तेजी और संवेदनशीलता के साथ कदम उठाती हैं।





