यमन संकट में पाकिस्तान का बड़ा यू-टर्न? सऊदी रक्षा समझौते ने बढ़ाई चुनौती

पाकिस्तान लंबे समय से यमन संघर्ष में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचता रहा है। लेकिन सऊदी अरब के साथ नए रक्षा समझौते, हूती हमलों और बदलते मध्य-पूर्वी समीकरणों ने इस्लामाबाद के सामने नई रणनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपनी पुरानी तटस्थ नीति से आगे बढ़कर सऊदी सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाएगा?
2015 में पाकिस्तान ने क्यों चुनी थी तटस्थता?
2015 में सऊदी अरब ने यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। रियाद ने पाकिस्तान से सैनिक, लड़ाकू विमान और नौसैनिक मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान की संसद ने उस समय यमन संघर्ष से दूर रहने का फैसला किया।
इस फैसले के पीछे पाकिस्तान की अपनी सुरक्षा और आंतरिक सांप्रदायिक संवेदनशीलता भी बड़ी वजह थी। हालांकि, संसद के प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया था कि अगर सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना जैसे पवित्र स्थलों को सीधा खतरा होता है, तो पाकिस्तान उनकी रक्षा के लिए खड़ा होगा।
मक्का समझौते ने बदली रणनीतिक तस्वीर
7 अगस्त 2026 को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के अनुसार तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान इसे किसी देश के खिलाफ गठबंधन नहीं, बल्कि रक्षात्मक और निवारक व्यवस्था बताता है।
हालांकि समझौते का पूरा पाठ सार्वजनिक नहीं किया गया है, इसलिए किसी हमले की स्थिति में पाकिस्तान किस स्तर की सैन्य सहायता देगा, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
हूती हमलों ने बढ़ाई पाकिस्तान की परीक्षा
मक्का समझौते के बाद सऊदी अरब पर हूती हमलों ने इस व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा खड़ी कर दी। सितंबर में पाकिस्तान ने कहा था कि हूती हमलों के जवाब में तत्काल कोई सैन्य कार्रवाई चर्चा में नहीं है, लेकिन जरूरत पड़ने पर वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।
सितंबर के अंत में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के सैन्य प्रमुखों की बैठक में खुफिया जानकारी साझा करने, सैन्य समन्वय और क्षमताओं के एकीकरण पर चर्चा हुई।
सबसे बड़ी चुनौती ईरान के साथ रिश्ते
यहीं से पाकिस्तान की विदेश नीति का सबसे कठिन सवाल सामने आता है। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा ईरान से लगती है और दोनों देशों के बीच सुरक्षा, व्यापार और सीमा से जुड़े मुद्दे पहले से संवेदनशील रहे हैं।
यदि सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष और बढ़ता है तथा पाकिस्तान को प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका निभानी पड़ती है, तो इसका असर तेहरान के साथ इस्लामाबाद के संबंधों पर पड़ सकता है। हालांकि पाकिस्तान अभी भी ईरान के साथ कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने की बात करता रहा है।
आर्थिक निर्भरता भी बड़ा कारण
पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब केवल सैन्य साझेदार नहीं है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में रियाद की सुरक्षा जरूरतों से पूरी तरह अलग रहना इस्लामाबाद के लिए आसान नहीं है।
दूसरी तरफ, किसी क्षेत्रीय युद्ध में खुलकर शामिल होने से पाकिस्तान को सैन्य खर्च, आंतरिक सुरक्षा और सांप्रदायिक तनाव जैसी अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
अब आगे क्या करेगा पाकिस्तान?
फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक बयानों से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान यमन में सीधे युद्ध लड़ने जा रहा है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि मक्का रक्षा समझौते ने पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति जरूर बदल दी है।
एक तरफ सऊदी अरब की सुरक्षा प्रतिबद्धता है, दूसरी तरफ ईरान के साथ संबंध और तीसरी तरफ पाकिस्तान की अपनी आर्थिक एवं आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां। इसलिए इस्लामाबाद के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि वह सऊदी अरब के साथ अपनी रक्षा प्रतिबद्धता निभाते हुए ईरान के साथ तनाव को किस तरह नियंत्रित करता है।





