‘हम, भारत के लोग’ से शुरू हुआ संविधान: क्या 1949 का वादा आज भी कायम है?

भारत के संविधान की प्रस्तावना सिर्फ कुछ शब्दों का परिचय नहीं, बल्कि सत्ता के स्रोत को लेकर एक बुनियादी घोषणा है। “हम, भारत के लोग” यह विचार सामने रखता है कि संविधान की वैधता जनता से आती है। लेकिन संविधान सभा के गठन और सार्वभौमिक मताधिकार के इतिहास को देखें तो 1949 का यह दावा अपने समय में पूरी तरह प्रतिनिधिक नहीं था।
‘हम, भारत के लोग’ का अर्थ क्या है?
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत इन शब्दों से होती है—“हम, भारत के लोग…”। इसके बाद भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त किया गया है।
इस भाषा में सत्ता का स्रोत सरकार नहीं, बल्कि जनता को माना गया है। यानी राज्य की संस्थाओं को अधिकार जनता के संवैधानिक संकल्प से मिलता है।
यही वजह है कि प्रस्तावना को संविधान की बुनियादी भावना समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या संविधान सभा पूरी तरह जनता द्वारा चुनी गई थी?
यहां इतिहास का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। संविधान सभा के सदस्य आज की तरह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से सीधे नहीं चुने गए थे।
1946 में संविधान सभा के चुनाव तत्कालीन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से हुए थे। ये विधानसभाएं भी उस समय लागू सीमित मताधिकार व्यवस्था के तहत चुनी गई थीं। इसलिए संविधान सभा की संरचना को आज के सार्वभौमिक लोकतांत्रिक चुनाव से सीधे समान नहीं माना जा सकता।
इसके बावजूद सभा में भारत के विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और राजनीतिक धाराओं के प्रतिनिधि शामिल थे और संविधान निर्माण की प्रक्रिया में लंबी बहसें हुईं।
सार्वभौमिक मताधिकार कब मिला?
भारत ने स्वतंत्र गणराज्य के रूप में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाया। 1951-52 के पहले आम चुनाव में 21 वर्ष या उससे अधिक आयु के नागरिकों को मतदान का अधिकार दिया गया था। बाद में 61वें संविधान संशोधन के जरिए मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।
इसका मतलब यह है कि संविधान सभा के गठन और स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव के बीच प्रतिनिधित्व की प्रकृति में महत्वपूर्ण अंतर था।
इसी संदर्भ में “हम, भारत के लोग” को एक संवैधानिक संकल्प और आगे पूरा किए जाने वाले लोकतांत्रिक वादे के रूप में देखने का विचार सामने आता है।
प्रस्तावना किन मूल्यों की बात करती है?
प्रस्तावना में चार प्रमुख संवैधानिक मूल्यों को रेखांकित किया गया है—
- न्याय — सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक
- स्वतंत्रता — विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना
- समानता — प्रतिष्ठा और अवसर की
- बंधुता — व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली
इन मूल्यों की जड़ें संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिसंबर 1946 में पेश किए गए उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution) में देखी जाती हैं।
1976 में प्रस्तावना में क्या बदला?
26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाए जाने के बाद प्रस्तावना में एक महत्वपूर्ण बदलाव 1976 में हुआ। आपातकाल के दौरान पारित 42वें संविधान संशोधन के जरिए प्रस्तावना में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द जोड़े गए।
इसी संशोधन के जरिए “राष्ट्र की एकता” की जगह “राष्ट्र की एकता और अखंडता” शब्द किए गए।
इन बदलावों को लेकर बाद के वर्षों में कानूनी और राजनीतिक बहस होती रही है। कुछ याचिकाओं में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्दों को हटाने की मांग भी की गई। दूसरी ओर, इनके समर्थकों का तर्क रहा है कि ये शब्द संविधान में पहले से मौजूद मूल्यों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं।
क्या 1949 का वादा आज भी जारी है?
“हम, भारत के लोग” को केवल इतिहास की एक पंक्ति के रूप में पढ़ना संविधान के लोकतांत्रिक अर्थ को सीमित कर देता है। इस वाक्य का वास्तविक महत्व इस बात में है कि नागरिक संविधान में दिए अधिकारों और संस्थाओं के साथ अपने संबंध को कैसे समझते हैं।
1949 में भारत का लोकतांत्रिक ढांचा अभी निर्माण की प्रक्रिया में था। सार्वभौमिक मताधिकार के जरिए करोड़ों नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी ने बाद में उस संवैधानिक दावे को व्यापक आधार दिया।
आज भी यह सवाल प्रासंगिक है कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे संवैधानिक आदर्श व्यवहार में किस हद तक दिखाई देते हैं। इसका जवाब किसी एक सरकार या संस्था से नहीं, बल्कि संविधान, अदालतों, संसद, चुनावों और नागरिक समाज के लंबे अनुभव से जुड़ा है।
‘हम’ की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण
संविधान की शुरुआत “सरकार” से नहीं, बल्कि “हम, भारत के लोग” से होती है। यह शब्द नागरिकों को केवल अधिकारों का धारक नहीं बनाते, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी भूमिका की ओर भी संकेत करते हैं।
हर चुनाव में मतदान करना, कानून के सामने समानता की मांग करना, मौलिक अधिकारों के लिए न्यायालय जाना और सार्वजनिक संस्थाओं से जवाबदेही की अपेक्षा करना—ये सभी उस संवैधानिक विचार को व्यवहार में जीवित रखने के तरीके हैं।
इसलिए 1949 में लिखा गया “हम, भारत के लोग” केवल अतीत का दावा नहीं है। यह हर पीढ़ी के सामने रखा गया एक संवैधानिक प्रश्न भी है—क्या राज्य और समाज वास्तव में उन न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के मूल्यों को लगातार मजबूत कर रहे हैं, जिनका संकल्प संविधान की शुरुआत में लिया गया था?





