
रीवा। संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) में कल्पना मिश्रा और उसके नवजात शिशु की मौत के बाद अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा को हटाकर डॉ. प्रियंका शर्मा को जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद अब अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल यह है कि जब अधीक्षक की भूमिका की समीक्षा हो सकती है तो अस्पताल के शीर्ष प्रशासनिक पद पर बैठे डीन की जवाबदेही और उनके पुराने रिकॉर्ड की समीक्षा क्यों नहीं?
मामला इसलिए भी गंभीर हो जाता है क्योंकि उपलब्ध न्यायालयीन रिकॉर्ड में डॉ. सुनील अग्रवाल के खिलाफ वर्ष 2015 में अपराध क्रमांक 543/2015 में धारा 354-D भादंवि तथा धारा 67 सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत FIR दर्ज होने का स्पष्ट उल्लेख है। रिकॉर्ड के अनुसार पुलिस ने जांच के दौरान गिरफ्तारी की गवाहों के बयान दर्ज किए और बाद में न्यायालय में अभियोग पत्र भी प्रस्तुत किया।
मामला दर्ज हुआ, गिरफ्तारी हुई और चालान भी पेश हुआ
न्यायालयीन दस्तावेज के अनुसार शिकायत के आधार पर पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की थी। जांच के दौरान डॉ. सुनील अग्रवाल की गिरफ्तारी का भी उल्लेख है और बाद में न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया। दस्तावेज में मामले से जुड़े मोबाइल, व्हाट्सऐप चैट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य सामग्री की जांच का भी विवरण दर्ज है।
लेकिन इस पूरे मामले का दूसरा और महत्वपूर्ण पक्ष भी है अदालत ने अंततः डॉ. सुनील अग्रवाल को धारा 354-D और IT Act की धारा 67 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। यानी रिकॉर्ड में मामला दर्ज होने और अभियोजन चलने की बात है लेकिन अंतिम न्यायिक परिणाम दोषमुक्ति का रहा।
अब सवाल नियुक्ति प्रक्रिया पर
यहीं से SGMH की मौजूदा व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अतीत में गंभीर धाराओं में मामला दर्ज होकर न्यायालय तक पहुंचा था, तो उच्च प्रशासनिक पद पर नियुक्ति अथवा जिम्मेदारी सौंपते समय क्या इस पूरे न्यायालयीन रिकॉर्ड का परीक्षण किया गया था?
और यदि रिकॉर्ड देखा गया था तो क्या शासन ने यह संतुष्ट किया कि मामला अंतिम रूप से दोषमुक्ति में समाप्त हो चुका है? यदि रिकॉर्ड की समीक्षा नहीं हुई तो जिम्मेदारी किसकी है?
कल्पना मिश्रा कांड ने फिर खोल दी पुरानी फाइल?
कल्पना मिश्रा की मौत के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं। अधीक्षक बदला जा चुका है लेकिन अब लोगों की नजर डीन की भूमिका पर है। क्या गंभीर मरीजों की स्थिति ऑन-ड्यूटी वरिष्ठ चिकित्सकों की उपलब्धता, आपातकालीन निर्णय प्रक्रिया और विभागीय निगरानी की जिम्मेदारी केवल अधीक्षक की थी या डीन भी प्रशासनिक रूप से जवाबदेह हैं?
यदि अस्पताल की व्यवस्था में कोई गंभीर कमी सामने आती है तो उसकी जांच केवल एक अधिकारी तक सीमित रखने के बजाय पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की समीक्षा जरूरी होगी।
CM से सीधा सवाल क्या डीन की भूमिका भी जांच के घेरे में आएगी?
राहुल मिश्रा पर कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन SGMH की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा कराएगा? क्या डीन की जिम्मेदारी पुराने न्यायालयीन रिकॉर्ड और अस्पताल में वरिष्ठ चिकित्सकों की उपलब्धता की जांच होगी?





