ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते तो विपक्ष के पास क्या विकल्प? जानिए CEC हटाने की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष ने मंगलवार को दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन किया। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत INDIA ब्लॉक के कई नेता मार्च में शामिल हुए। पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने से रोका, जिसके बाद विपक्षी नेताओं ने घंटों धरना दिया। अब सवाल है कि अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो विपक्ष के पास उन्हें हटाने के लिए कौन-कौन से संवैधानिक और कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं?
दिल्ली में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन
6 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के सांसद संसद परिसर से निर्वाचन आयोग की ओर मार्च करने निकले। प्रदर्शनकारी SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे लगा रहे थे।
पुलिस ने मार्च को निर्वाचन सदन तक पहुंचने से पहले रोक दिया। इसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने आकाशवाणी भवन परिसर के पास धरना दिया। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर “Gyanesh, it’s done bro. Time to resign” लिखा।
विपक्ष का आरोप है कि SIR प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें अभी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
इस्तीफा नहीं देते तो क्या सीधे हटाया जा सकता है?
नहीं। मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल राजनीतिक दबाव या प्रदर्शन के आधार पर पद से नहीं हटाया जा सकता।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है। 2023 के CEC और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 11(2) में भी यही व्यवस्था दोहराई गई है।
हटाने का आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होना चाहिए। केवल आरोप लगना अपने आप में हटाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
संसद में हटाने का प्रस्ताव सबसे बड़ा संवैधानिक रास्ता
विपक्ष के पास सबसे स्पष्ट संवैधानिक विकल्प संसद में हटाने की प्रक्रिया शुरू करना है। इसके लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसद हस्ताक्षर वाले नोटिस के जरिए प्रस्ताव ला सकते हैं।
नोटिस संबंधित सदन के स्पीकर या सभापति के पास जाता है। वह इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। अगर प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के जज/मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं।
अगर जांच में कदाचार या अक्षमता साबित होती है, तभी मामला संसद में आगे बढ़ता है।
दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी
जांच के बाद भी CEC की तत्काल बर्खास्तगी नहीं होती। प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत से पारित होना पड़ता है।
इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई समर्थन आवश्यक है। दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति के समक्ष हटाने का अभिभाषण जाता है और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं।
विपक्ष पहले भी आजमा चुका है यह रास्ता
यह प्रक्रिया केवल सैद्धांतिक नहीं है। 2026 में विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस दिए थे। रिपोर्टों के मुताबिक लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे।
हालांकि, दोनों नोटिस स्वीकार नहीं किए गए। लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति ने संबंधित प्रस्तावों को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था।
इसलिए दोबारा ऐसा प्रयास होने पर भी पहला महत्वपूर्ण पड़ाव यही होगा कि संबंधित पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का रास्ता कितना अलग है?
विपक्ष SIR और मतदाता सूची से जुड़े किसी विशेष फैसले या कार्रवाई को अदालत में चुनौती दे सकता है। लेकिन इसे CEC को हटाने की सीधी प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।
यदि किसी मतदाता का नाम हटाने, जोड़ने या पुनरीक्षण की प्रक्रिया में कानून के उल्लंघन का आरोप है, तो प्रभावित व्यक्ति या संगठन उपयुक्त न्यायिक मंच का रुख कर सकते हैं। अदालत मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर राहत पर विचार कर सकती है।
यानी अदालत में चुनौती का केंद्र किसी विशेष चुनावी प्रक्रिया या निर्णय की वैधता हो सकता है, जबकि CEC को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अलग है।
चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर भी उठ रहे सवाल
विपक्ष SIR से जुड़े फैसलों, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और आयोग के कामकाज को लेकर भी न्यायिक समीक्षा की मांग कर सकता है।
2023 के कानून की धारा 17 के तहत चुनाव आयोग के कामकाज में सामान्य तौर पर निर्णय सर्वसम्मति से लेने का प्रयास किया जाता है और मतभेद होने पर बहुमत का मत प्रभावी होता है। इसलिए केवल किसी एक आयुक्त की असहमति सामने आने से आयोग का फैसला अपने आप अवैध नहीं हो जाता।
यही वजह है कि किसी निर्णय को चुनौती देने के लिए उसके खिलाफ ठोस कानूनी आधार और मामले-विशेष के तथ्य जरूरी होंगे।
अब विपक्ष की रणनीति क्या हो सकती है?
राजनीतिक स्तर पर विपक्ष SIR और CEC के मुद्दे को बड़ा राष्ट्रीय अभियान बना सकता है। मंगलवार का मार्च इसी रणनीति का हिस्सा दिखाई दिया, जिसमें कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए।
इसके अलावा विपक्ष संसद में प्रस्ताव, अदालतों में याचिकाएं, राज्यवार मतदाता सूची से जुड़े मामले और देशव्यापी राजनीतिक अभियान जैसे रास्ते अपना सकता है। हालांकि इनमें से कोई भी कदम अपने आप CEC को पद से हटाने की गारंटी नहीं देता।
CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष का आंदोलन लगातार तेज हो रहा है। लेकिन इस्तीफा न देने की स्थिति में उन्हें हटाना आसान नहीं होगा। संविधान ने CEC के पद को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए बेहद मजबूत सुरक्षा दी है। विपक्ष के पास संसद में हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का विकल्प है, लेकिन इसके लिए आरोपों की जांच, दोनों सदनों में विशेष बहुमत और राष्ट्रपति की संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। दूसरी ओर, SIR या मतदाता सूची से जुड़े विशिष्ट फैसलों को अदालतों में चुनौती देना एक अलग कानूनी रास्ता है।





