
रीवा। जिले में खनिज कारोबार और रतहरा चोरहटा सड़क निर्माण को लेकर एक गंभीर विवाद सामने आया है। एक वीडियो सामने आने के बाद ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं जिनसे खनिज विभाग की निगरानी व्यवस्था रॉयल्टी (टीपी) जारी करने की प्रक्रिया और निर्माण कार्यों में उपयोग की गई गिट्टी की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं। वीडियो में किए गए दावों और उपलब्ध जानकारी के आधार पर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।
सामने आए वीडियो में क्रशर की देखरेख से जुड़े बताए जा रहे प्रशांत मिश्रा कथित तौर पर कहते दिखाई देते हैं कि संबंधित क्रशर वर्ष 2019 में शुरू हुआ था लेकिन 2020 से बंद हो गया था। उनके अनुसार बंदी के दौरान क्रशर परिसर से बिजली के तार चोरी हो गए थे और ट्रांसफार्मर भी खराब हो गया था। उनका यह भी दावा है कि आवश्यक मरम्मत के बाद करीब डेढ़ माह पहले ही क्रशर का संचालन दोबारा शुरू किया गया।
इसी कथित बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि क्रशर वर्षों तक बंद रहा तो उस दौरान रॉयल्टी (टीपी) किस आधार पर जारी होती रही? खनिज नियमों के अनुसार टीपी वास्तविक खनिज उत्पादन और वैध परिवहन के आधार पर जारी की जाती है। ऐसे में यदि उत्पादन ही नहीं हुआ तो रिकॉर्ड में उत्पादन किस आधार पर दर्ज किया गया और टीपी जारी करने की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी हुई? यही सवाल अब पूरे मामले का केंद्र बन गया है।
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि रतहरा चोरहटा सड़क का निर्माण कर रही KCC कंपनी द्वारा इसी क्रशर से जारी टीपी का उपयोग किया गया। हालांकि इस संबंध में कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि भी अभी नहीं हुई है। फिर भी वीडियो में किए गए दावों के बाद इस पहलू की भी जांच की मांग तेज हो गई है।
मामले में क्रशर संचालक महेंद्र गुप्ता की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि वीडियो में किया गया दावा सही है कि क्रशर लंबे समय तक बंद था तो फिर उसी अवधि में कथित रूप से जारी हुई टीपी का आधार क्या था? क्या बिना वास्तविक उत्पादन के कागजी अभिलेखों में उत्पादन दिखाया गया या फिर किसी अन्य प्रक्रिया के माध्यम से रॉयल्टी जारी होती रही? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने खनिज विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी क्रशर का संचालन बंद था तो विभागीय निरीक्षण के दौरान इसकी जानकारी रिकॉर्ड में अवश्य रही होगी। ऐसे में यदि टीपी जारी हुई, तो उसके लिए किस स्तर पर अनुमति दी गई और किस आधार पर उत्पादन प्रमाणित किया गया? क्या विभाग ने स्थल निरीक्षण किया था या केवल दस्तावेजों के आधार पर प्रक्रिया पूरी की गई? यह भी जांच का महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है।
खनिज कारोबार से जुड़े जानकारों का कहना है कि टीपी जारी करने की पूरी प्रक्रिया डिजिटल और दस्तावेजी रिकॉर्ड पर आधारित होती है। इसलिए यदि किसी बंद क्रशर से लंबे समय तक टीपी जारी होने के आरोप सही पाए जाते हैं तो केवल निजी पक्ष ही नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था की भी गहन जांच आवश्यक होगी। इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं राजस्व को नुकसान पहुंचाने या नियमों के उल्लंघन का मामला तो नहीं हुआ।
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वीडियो में किए गए दावों टीपी रिकॉर्ड, उत्पादन रजिस्टर, निरीक्षण रिपोर्ट तथा सड़क निर्माण में प्रयुक्त गिट्टी के स्रोत की निष्पक्ष और तकनीकी जांच कराई जाए। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। वहीं यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो जांच रिपोर्ट से स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी।





