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सोशल मीडिया की बढ़ती अफवाहें पुलिस के लिए नई चुनौती

डिजिटल युग में जहाँ स्मार्टफोन आम जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है वहीं सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें समाज और कानून-व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। आज लगभग हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है और लोग दिनभर उसके माध्यम से जानकारी मनोरंजन और संचार में व्यस्त रहते हैं। लेकिन इसी डिजिटल सुविधा ने एक नया संकट जन्म दिया हैऐसी पोस्टें जो बिना सोचे-समझे वायरल कर दी जाती हैं और जिनकी वजह से किसी की इज्जत प्रतिष्ठा और कई बार जीवन तक खतरे में पड़ जाता है।

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ गति सत्य से तेज है। सूचना की सत्यता की पुष्टि किए बिना ही लोग पोस्ट आगे बढ़ा देते हैं। कई बार मज़ाक या गुस्से में की गई एक पोस्ट किसी व्यक्ति या परिवार के लिए बदनामी का कारण बन सकती है। दुर्भाग्य से ऐसी घटनाएँ कम नहीं जहाँ झूठ या अपुष्ट जानकारी वायरल होने पर प्रभावित व्यक्ति मानसिक दबाव में आकर आत्मघाती कदम तक उठा लेता है। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि समाजिक चेतना और जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न है।

पुलिस विभाग के लिए भी यह एक गंभीर चुनौती बन चुका है। पहले जहाँ अपराध की सूचना पारंपरिक माध्यमों से मिलती थी अब फर्जी खबरें, फोटो पुराने वीडियो और भ्रामक संदेशों का प्रवाह इतना तेज है कि वास्तविकता तक पहुँचने में समय और संसाधनों दोनों की बड़ी खपत हो जाती है। कई बार किसी घटना के बारे में सोशल मीडिया पर वायरल अफवाहें क्षेत्र में तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ देती हैं। पुलिस को तत्काल सफाई जारी कर लोगों को विश्वास में लेने की मजबूरी होती है।

जानकारी के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में साइबर अपराध, फेक न्यूज प्रतिष्ठा हनन और सोशल मीडिया दुरुपयोग से जुड़े मामलों में तेजी आई है। पुलिस लगातार जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को सलाह दे रही है कि बिना पुष्टि के कोई भी पोस्ट वीडियो या संदेश साझा न करें। इसके बावजूद कई लोग भावनाओं में बहकर या केवल वायरल करने के उद्देश्य से ऐसी सामग्री फैलाते हैं जो किसी की सामाजिक स्थिति और जीने का हक दोनों छीन लेती है।

मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि सोशल मीडिया पर चरित्र विवाद गलत आरोप या मजाक उड़ाने वाली पोस्टें व्यक्ति को मानसिक अवसाद की ओर धकेल सकती हैं। कई मामलों में देखा गया है कि युवाओं ने सिर्फ एक अपमानजनक पोस्ट या छेड़छाड़ किए गए फोटो के वायरल होने पर आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया। यह केवल डिजिटल शरारत नहीं बल्कि गंभीर अपराध है जिसके लिए कानून में सख्त प्रावधान हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध या भ्रामक पोस्ट फैलाने वालों पर आईटी एक्ट साइबर अपराध नियमों और आईपीसी की धाराओं के अंतर्गत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। पुलिस भी ऐसे मामलों में निगरानी बढ़ा चुकी है और लोगों से संयम और जिम्मेदारी से सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की अपील कर रही है।

समाज के स्तर पर भी यह समझने की जरूरत है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि एक शक्तिशाली मंच है। यहाँ फैलाया गया शब्द, तस्वीर या वीडियो किसी के जीवन को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। जिम्मेदारी इसी में है कि हम पोस्ट को शेयर करने से पहले सोचें क्या यह सच है? क्या इससे किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता है? क्या यह समाज में गलत संदेश फैलाएगा?

आज के दौर में तकनीक का जिम्मेदार उपयोग समय की मांग है। सोशल मीडिया के दुरुपयोग से न केवल समाज में अविश्वास और तनाव बढ़ रहा है बल्कि कई परिवारों को अपूरणीय क्षति भी हो रही है। इसलिए आवश्यक है कि हर नागरिक खासकर युवा डिजिटल विवेक और संवेदनशीलता के साथ सोशल मीडिया का उपयोग करें ताकि अफवाहें न फैलें और किसी की प्रतिष्ठा तथा जीवन सुरक्षित रहे।

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