विकास बना मज़ाक: PWD क्रमांक-1 में लापरवाही और भ्रष्टाचार की खुली पोल

दंडवत से दहला दरबार: सड़क गायब, पुल अधूरा… 2.51 करोड़ की मंजूरी के बाद भी क्यों थमा विकास? 15 मार्च की चेतावनी से बढ़ा प्रशासन पर दबाव
रीवा। जनसुनवाई का दिन इस बार सिर्फ औपचारिकता नहीं बल्कि उबलते जनाक्रोश का प्रतीक बन गया। विभाग क्रमांक-1 में कथित भ्रष्टाचार और वर्षों से अधूरे पड़े सड़क-पुल निर्माण को लेकर एक युवक ने कलेक्ट्रेट गेट से कार्यालय तक दंडवत परिक्रमा कर प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया। हाथ में नारियल और आवेदन लिए पहुंचे युवक ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों और ठेकेदार पर मिलीभगत का गंभीर आरोप लगाया जिससे पूरे परिसर में सनसनी फैल गई।
मामला सिरमौर विधानसभा की जवा तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत गाढ़ा 138 के कोटिहा टोला और खटिकान टोला का है। ग्रामीणों का आरोप है कि आजादी के 78 वर्ष बाद भी बुनियादी सड़क और पुल जैसी सुविधा यहां सपना ही बनी हुई है। बरसात के चार महीनों में हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि हजारों लोग गांव में कैद होकर रह जाते हैं। स्कूली बच्चों की पढ़ाई ठप पड़ जाती है तो गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को उफनते नाले के पार खाट के सहारे ढोकर ले जाना पड़ता है। कई बार जान जोखिम में डालकर ग्रामीणों ने अपनों को अस्पताल पहुंचाया है।
शिकायतकर्ता धनेश सोनकर का दावा है कि लगातार संघर्ष और आवेदन के बाद करीब 2.51 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत कराई गई थी। तीन वर्ष पूर्व विधिवत निविदा प्रक्रिया भी पूरी हुई जिससे ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि अब उनकी तकदीर बदलेगी। लेकिन आरोप है कि निर्माण कार्य में भारी अनियमितता बरती गई। अधूरे पुल और कच्ची सड़क के नाम पर सिर्फ औपचारिक काम कर फाइलें बंद कर दी गईं। सोनकर का कहना है कि संबंधित एसडीओ और ठेकेदार की सांठगांठ से सरकारी धन की लीपापोती हुई और निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया।
युवक का आरोप है कि वह दो वर्षों से अधिक समय से जनसुनवाई और पीडब्ल्यूडी कार्यालय के चक्कर काट रहा है। हर बार जांच और कार्रवाई का आश्वासन मिला लेकिन जमीनी स्तर पर कोई प्रगति नहीं हुई। अधिकारियों की उदासीनता से क्षुब्ध होकर उसने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया। कलेक्ट्रेट गेट से दंडवत परिक्रमा करते हुए कार्यालय तक पहुंचना और नारियल के साथ आवेदन सौंपना प्रशासन को जगाने का प्रतीकात्मक प्रयास था।
धनेश सोनकर ने मांग की है कि अधूरे निर्माण को तत्काल पूर्ण कराया जाए या नई निविदा जारी कर कार्य दोबारा प्रारंभ कराया जाए। उसने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि 15 मार्च तक मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वह आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर होगा जिसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। युवक की इस चेतावनी के बाद प्रशासनिक महकमे में हलचल तेज हो गई है। अब देखना यह है कि करोड़ों की मंजूरी के बावजूद अधूरे पड़े विकास कार्यों पर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होती है या फिर यह मामला भी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा।






