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DGP के सख्त निर्देश बनाम रीवा की हकीकत! NDPS में ढिलाई का खेल सेमरिया कांड में जांच तक सीमित कार्रवाई पर उठे सवाल

MediaAuditor.रीवा प्रदेश में नशामुक्त मध्यप्रदेश के संकल्प को लेकर जहां पुलिस मुख्यालय स्तर पर सख्त रणनीति बनाई जा रही है वहीं रीवा रेंज से सामने आए एक मामले ने इस पूरे अभियान की जमीनी सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस महानिदेशक (DGP) द्वारा हाल ही में नारकोटिक्स के खिलाफ निर्णायक अभियान चलाने के निर्देश दिए गए लेकिन सेमरिया थाना क्षेत्र में NDPS Act से जुड़े घटनाक्रम ने इन दावों को चुनौती दी है।

भोपाल में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में DGP ने स्पष्ट रूप से कहा कि 1 अप्रैल 2026 से मादक पदार्थों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान के तहत Narco Coordination Centre (NCORD) के माध्यम से समन्वय, टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी, साइबर ट्रैकिंग, मुखबिर तंत्र को मजबूत करने और ड्रग्स नेटवर्क को जड़ से खत्म करने पर जोर दिया गया। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए गए कि केवल छोटे आरोपियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है बल्कि पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करना आवश्यक है।

लेकिन इन सख्त निर्देशों के बीच रीवा रेंज के सेमरिया थाना क्षेत्र से सामने आया मामला अलग ही तस्वीर पेश करता है। जानकारी के अनुसार कोटर थाना जिला सतना के अबेर गांव से पकड़े गए दो आरोपी अभिषेक और अमित को NDPS Act के तहत हिरासत में लिया गया था। हालांकि आरोप है कि उन्हें थाने में विधिवत कार्रवाई के बजाय करीब 6 घंटे तक निरीक्षक के कमरे में बैठाकर रखा गया और बाद में एक फोन कॉल के बाद छोड़ दिया गया।

सूत्रों का कहना है कि इस दौरान थाना प्रभारी जो उस समय रीवा में निजी कार्य से मौजूद थे उनसे लगातार दूरभाष पर बातचीत होती रही। देर शाम अचानक परिस्थितियां बदलीं और दोनों आरोपियों को बिना किसी स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया के रिहा कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले में एक और चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि आरोपियों को थाने के अलावा निजी स्तर पर भी बैठाकर निर्णय लेने की चर्चा है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस तरह की बातें जांच को और अधिक संवेदनशील बना रही हैं।

सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि जब इस पूरे मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों आईजी, डीआईजी, एसपी और अन्य स्तरों तक पहुंच चुकी है तो फिर कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हो रही है? क्या जांच को जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है या फिर किसी दबाव के चलते कार्रवाई टाली जा रही है?

स्थानीय नागरिकों और जानकारों का कहना है कि NDPS Act जैसे सख्त कानून में इस प्रकार की ढिलाई न केवल कानून के उद्देश्य को कमजोर करती है बल्कि अपराधियों के हौसले भी बढ़ाती है। यदि ऐसे मामलों में समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं होती तो यह पूरे पुलिस तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।

DGP द्वारा जहां एक ओर मुखबिर तंत्र को मजबूत करने और हॉट स्पॉट्स पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं वहीं दूसरी ओर इस तरह के मामलों में आरोपियों को छोड़ना और फिर कार्रवाई में देरी होना विरोधाभासी स्थिति को दर्शाता है। इससे यह संदेश जाता है कि नीति और क्रियान्वयन के बीच कहीं न कहीं बड़ा अंतर है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार इस मामले में जांच अभी जारी है और विभिन्न पहलुओं को खंगाला जा रहा है। लेकिन जब तक ठोस कार्रवाई सामने नहीं आती तब तक सवाल उठते रहेंगे। पुलिस महकमे में भी इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज है और कई अधिकारी इस पूरे मामले को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं।

वही रीवा रेंज की पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी साख को कैसे बनाए रखे और जनता का विश्वास कैसे कायम रखे।

अब सबसे बड़ा सवाल क्या नशामुक्त मध्यप्रदेश का सपना जमीनी हकीकत में बदलेगा या फिर रीवा के सेमरिया जैसे मामले इस अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहेंगे?

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