
रीवा। नई यूजीसी नियमावली को लेकर देशभर में छिड़ी बहस अब खुली सियासी जंग में बदलती दिखाई दे रही है। एक तरफ सामान्य वर्ग के संगठनों का आरोप है कि सरकार ने उनकी चिंताओं को दरकिनार कर नियम थोप दिया तो दूसरी ओर एसटी एससी और ओबीसी वर्ग के संगठन इसे सामाजिक न्याय की अनिवार्य प्रक्रिया बता रहे हैं। सवाल यह है कि क्या नीति निर्माण संवाद से होगा या सड़कों की ताकत से?
नियम लागू होते ही सवर्ण वर्ग में उबाल आ गया। न्यायालय में दायर याचिका पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने नियम के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। अदालत के इस फैसले ने आग में घी का काम किया। जिन वर्गों ने नियम को अपने अधिकारों की सुरक्षा माना था उन्होंने इसे सामाजिक न्याय पर प्रहार बताया और विरोध की तैयारी शुरू कर दी।
देश की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है लेकिन हर बार यह समाज को दो खेमों में खड़ा कर देता है। एक पक्ष का कहना है कि आरक्षण ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई का संवैधानिक साधन है। दूसरे पक्ष का तर्क है कि लगातार बढ़ते दायरे ने समान अवसर और योग्यता की अवधारणा को कमजोर कर दिया है। इसी खींचतान के बीच असली सवाल गुम होता जा रहा है क्या नीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना है या वोट बैंक को साधना?
रीवा में इस बहस की तपिश साफ नजर आई। आरक्षण लागू करने के विरोध में कुछ संगठनों ने शहर का मुख्य मार्ग जाम कर दिया। घंटों तक यातायात ठप रहा। आम लोग परेशान रहे स्कूल के बच्चे बसों में फंसे रहे मरीज अस्पताल पहुंचने के लिए जूझते रहे। व्यापारियों ने कहा कि रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ा। सवाल उठता है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध का मतलब आम जनता को सजा देना है?
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी आवाज नहीं सुनी जाएगी आंदोलन जारी रहेगा। वहीं दूसरी ओर आरक्षण समर्थक संगठनों ने भी चेतावनी दी है कि यदि नियम स्थायी रूप से रोका गया तो वे भी सड़कों पर उतरेंगे। यानी टकराव की आहट साफ सुनाई दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आरक्षण और समानता की बहस भावनाओं से नहीं तथ्यों और व्यापक सामाजिक संवाद से सुलझाई जानी चाहिए। लेकिन फिलहाल जो तस्वीर दिख रही है उसमें संवाद कम और आरोप-प्रत्यारोप ज्यादा नजर आ रहे हैं।
यूजीसी नियम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि शिक्षा और अवसर से जुड़ा हर फैसला केवल प्रशासनिक आदेश नहीं होता वह समाज की संवेदनशील नसों को छूता है। अब देखना यह है कि सरकार न्यायपालिका और समाज मिलकर समाधान का रास्ता निकालते हैं या फिर आरक्षण की यह आग और भड़कती है। रीवा की सड़कों पर दिखा यह उबाल संकेत दे रहा है कि मुद्दा केवल नियम का नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन का है और यदि इसे समय रहते नहीं संभाला गया तो हालात और भी जटिल हो सकते हैं।





