NDPS मामले में आरोपी बने मेहमान! 6 घंटे की मेहमाननवाजी के बाद रिहाई, कॉल डिटेल से खुल सकती है गुत्थी

Mediaauditor Rewa: नशे के खिलाफ सख्त कानून के तौर पर पहचाने जाने वाले NDPS Act के तहत रीवा जिले में सामने आया एक मामला पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है wwwकि जिन दो युवकों को मादक पदार्थ से जुड़े मामले में पकड़ा गया zeeउन्हें थाने में आरोपी की तaरह नहीं बल्कि मेहमान की तरह रखा गया और बाद में रहस्यमयी परिस्थितियों में छोड़ दिया गया।
जानकारी के अनुसार कोटर थाना क्षेत्र के अबेर गांव से पुलिस ने दो युवकों को हिरासत में लिया था। इस कार्रवाई में एएसआई सहित अन्य शामिल थे। बताया जा रहा है कि दोनों को मेमोरेंडम के आधार पर पकड़ा गया और इसके बाद पुलिस टीम उन्हें सेमरिया थाने लेकर पहुंची।
हालांकि थाने पहुंचने के बाद घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। सूत्रों के मुताबिक दोनों युवकों के खिलाफ न तो तुरंत एफआईआर दर्ज की गई और न ही NDPS Act के तहत आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया। इसके विपरीत उन्हें सीधे निरीक्षक कक्ष में बैठा दिया गया जहां वे करीब छह घंटे तक मौजूद रहे दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे तक।
इस दौरान न तो किसी औपचारिक पूछताछ का रिकॉर्ड सामने आया और न ही कोई दस्तावेजी कार्रवाई की जानकारी मिली। यही नहीं यह भी बताया जा रहा है कि इस पूरे समय के दौरान सेमरिया थाना प्रभारी जो उस समय रीवा में मौजूद थे उनसे लगातार फोन पर बातचीत होती रही। शाम होते-होते अचानक पूरा मामला पलट गया। जिन युवकों को गंभीर आरोपों में पकड़ा गया था उन्हें बिना किसी ठोस कार्रवाई के छोड़ दिया गया। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।
सूत्रों में चर्चा है कि इस दौरान कुछ प्रभावशाली लोगों की एंट्री हुई और कथित तौर पर अंदरखाने कोई समझौता या डील हुई। हालांकि इस तरह के किसी लेन-देन की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन जिस तेजी से मामला बदला उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला सामने आने के बाद उच्च अधिकारियों ने संज्ञान लिया है और थाना प्रभारी से केस डायरी तलब की गई है। बावजूद इसके जांच की रफ्तार धीमी बनी हुई है जिससे लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
एक और अहम सवाल यह उठ रहा है कि इतनी गंभीर घटना की जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा सीधे क्यों नहीं की जा रही। फिलहाल जांच अधीनस्थ स्तर पर ही सीमित नजर आ रही है जिससे पारदर्शिता को लेकर शंकाएं और गहरा रही हैं।
अब इस मामले में कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) जांच का प्रमुख आधार बन सकता है। जानकारों का मानना है कि घटना वाले दिन संबंधित पुलिसकर्मियों और थाना प्रभारी के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल का मिलान किया जाए तो अबेर गांव से लेकर सेमरिया और फिर रीवा तक की पूरी कड़ी स्पष्ट हो सकती है।
तकनीकी साक्ष्य के रूप में कॉल रिकॉर्ड यह बता सकते हैं कि किन-किन लोगों के बीच बातचीत हुई किस समय निर्देश दिए गए और किस स्तर पर निर्णय लिया गया। इससे यह भी स्पष्ट हो सकता है कि आरोपियों को छोड़ने के पीछे कोई दबाव था या फिर कोई अन्य कारण।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लोगों में आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि NDPS जैसे सख्त कानून में भी इस तरह की लापरवाही या सेटिंग की आशंका बनेगी तो कानून का डर खत्म हो जाएगा और अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे।
फिलहाल पुलिस विभाग की चुप्पी कई सवालों को जन्म दे रही है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या कॉल डिटेल जैसे अहम पहलुओं को जांच में शामिल कर सच्चाई सामने लाई जाएगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।





