कागजी गौशाला का बड़ा खेल! घटेहा में गायों का घोटाला, जिम्मेदार अफसर बने मूकदर्शक

रीवा। त्यौंथर जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले घटेहा ग्राम पंचायत की गौशाला एक बार फिर गंभीर अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सुर्खियों में है। कागजों में सैकड़ों गायों के संरक्षण का दावा किया जा रहा है लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पूरी तरह पोल खोलती नजर आ रही है। स्थानीय ग्रामीणों का साफ कहना है कि रिकॉर्ड में दिखाई जा रही गायों की संख्या और मौके पर मौजूद गायों में भारी अंतर है।
ग्रामीणों के अनुसार गौशाला में जितनी संख्या कागजों में दर्शाई जा रही है उतनी गायें वहां मौजूद ही नहीं हैं। इस स्थिति ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब गौशाला के संचालन की जिम्मेदारी एक एनजीओ त्यौंथर एग्रो फॉर्मर प्रोड्यूसर प्राइवेट लिमिटेड को सौंपी गई है तो फिर निगरानी व्यवस्था पूरी तरह फेल क्यों नजर आ रही है? क्या यह जिम्मेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित होकर रह गई है?
ग्रामीणों का आरोप है कि यह पूरा खेल जनपद पंचायत के संरक्षण में चल रहा है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह मामला केवल एक गौशाला तक सीमित नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिम्मेदार अधिकारी या तो अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं।
इस पूरे मामले में जनपद पंचायत के सीईओ और पशु चिकित्सा अधिकारी की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि दोनों अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में पूरी तरह विफल रहे हैं। यदि समय-समय पर निरीक्षण और निगरानी की जाती तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।
वहीं गौशाला संचालक की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि व्यवस्थाओं को सुधारने के बजाय संचालक एक तथाकथित समाजसेवी के इर्द-गिर्द ही सक्रिय रहता है जिससे गौशाला की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। पशुओं के रख-रखाव भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं में भारी लापरवाही सामने आ रही है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी गौशाला संचालन को लेकर सरपंच पति और एनजीओ संचालक के बीच विवाद हो चुका है। मामला थाना तक पहुंचा था लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। इसके बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया बल्कि हालात और बदतर होते चले गए।
लगातार शिकायतों के बावजूद प्रशासन द्वारा कोई ठोस कदम न उठाया जाना अब प्रशासनिक नीयत पर भी सवाल खड़े कर रहा है। ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है और वे इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा या फिर गौमाता के नाम पर चल रहा यह कागजी खेल यूं ही जारी रहेगा? यदि अब भी सख्ती नहीं हुई तो यह साफ संकेत होगा कि व्यवस्था में जवाबदेही खत्म हो चुकी है और भ्रष्टाचार को खुली छूट मिल चुकी है।





