रीवा पुलिस में अदृश्य संरक्षण का शक! दागी थाना प्रभारियों की जांच महीनों से अधर में, क्या फाइलों की धूल में दबा दिया गया भ्रष्टाचार?

रीवा। रीवा जिले के पुलिस महकमे में एक बार फिर ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महीनों पहले जिन थाना प्रभारियों पर रिश्वतखोरी और अवैध लेन-देन के संगीन आरोप लगे थे उनकी विभागीय जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी है। इस असामान्य देरी ने न सिर्फ लापरवाही, बल्कि पुलिस विभाग के भीतर किसी अदृश्य संरक्षण तंत्र की आशंका को भी जन्म दे दिया है।
सूत्रों के अनुसार रायपुर कर्चुलियान थाना के तत्कालीन थाना प्रभारी पर एक सड़क दुर्घटना के मामले को लगभग 30 हजार रुपये लेकर रफा-दफा करने के गंभीर आरोप लगे थे। बताया जाता है कि दुर्घटनाग्रस्त वाहन को जब्त करने और सख्त कानूनी कार्रवाई का दबाव बनाकर बाद में रकम लेकर पूरा मामला समाप्त कर दिया गया। जब यह प्रकरण मीडिया के माध्यम से सामने आया तो विभाग ने जांच के आदेश दिए लेकिन आज दिनांक तक न तो जांच की स्थिति सार्वजनिक की गई और न ही किसी निष्कर्ष की आधिकारिक जानकारी सामने आई है।
इसी तरह बैकुंठपुर थाना क्षेत्र में भी तत्कालीन थाना प्रभारी पर लगभग 10 हजार रुपये लेकर दुर्घटनाग्रस्त वाहन छोड़ने और प्रकरण को कमजोर करने के आरोप लगे थे। इस मामले में वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर एक आईपीएस अधिकारी द्वारा जांच शुरू किए जाने की बात कही गई थी लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई और न ही किसी प्रकार की ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानकारी दी गई।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या केवल लाइन हाजिर कर देना ही कार्रवाई मान ली गई है? क्या रिश्वत और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों में लिप्त पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभाग के पास ठोस दंडात्मक इच्छाशक्ति ही नहीं है? जानकारों का कहना है कि इस तरह की ढिलाई से जहां ईमानदार पुलिसकर्मियों का मनोबल टूटता है वहीं भ्रष्ट तत्वों के हौसले और मजबूत होते हैं।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि दोनों ही मामलों से जुड़ी फाइलें रीवा पुलिस अधीक्षक कार्यालय के अधीन बताई जा रही हैं जहां वे कथित तौर पर धूल फांक रही हैं। न तो किसी प्रकार की स्पष्ट समयसीमा तय की गई और न ही यह बताया गया कि जांच किस स्तर पर लंबित है। इससे पुलिस विभाग की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सूत्रों का यह भी दावा है कि आरोपों से घिरे कुछ निरीक्षक अब दोबारा थाना पाने की जुगत में लगे हुए हैं। इसके लिए न्यायालय से लेकर राजनीतिक गलियारों और वरिष्ठ अधिकारियों तक सिफारिशें लगाने की चर्चाएं आम हो चली हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या रीवा पुलिस इन मामलों में निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई करेगी या फिर यह पूरा मामला भी अन्य प्रकरणों की तरह फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा?





