रीवा पुलिस महकमे में घमासान!अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पर भ्रष्टाचार, दबाव और अवैध वसूली के संगीन आरोप थानों से लेकर टोल-शराब दुकानों तक सेटिंग सिस्टम की चर्चा, विभाग की साख दांव पर

मीडिया ऑडीटर, रीवा (निप्र)। रीवा पुलिस महकमा एक बार फिर गंभीर विवादों के भंवर में फंसता नजर आ रहा है। जिले में पदस्थ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को लेकर भ्रष्टाचार अनुचित दबाव और कथित अवैध वसूली के आरोपों की गूंज एक बार फिर तेज हो गई है। पूर्व पदस्थापना के दौरान उनके रीडर के ट्रैप होने की घटना के बाद यह उम्मीद जगी थी कि कार्यशैली में सुधार आएगा लेकिन सूत्रों की मानें तो हालात इसके बिल्कुल उलट बताए जा रहे हैं।
पुलिस विभाग से जुड़े अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ट्रैप कांड के बाद साहब की कार्यप्रणाली में बदलाव के बजाय दबाव और अपेक्षाएं और अधिक बढ़ गईं। शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक थानों में साहब के कथित शौक और मांगों की लंबी सूची चर्चाओं का विषय बनी हुई है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि थाना प्रभारियों उप निरीक्षकों और निरीक्षकों को आपस में यह कहते सुना जा रहा है
साहब अब तो माफ कर दीजिए।
आरोप है कि पद और प्रभाव के आगे न तो उप निरीक्षकों की सुनी जा रही है और न ही अनुभवी निरीक्षकों की। कई थानों में पुलिसकर्मी मानसिक दबाव में काम करने को मजबूर हैं। सूत्र बताते हैं कि कुछ थाना प्रभारी तो हालात से बचने के लिए एसपी कार्यालय जाने से भी कतराने लगे हैं। विभाग के भीतर पनप रहा यह असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है।
चर्चाओं के मुताबिक जिले में टोल प्लाजा शराब दुकानों और थानों तक एक कथित सेटिंग सिस्टम सक्रिय है। यह भी कहा जा रहा है कि इस व्यवस्था की जानकारी केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है बल्कि वरिष्ठ स्तर तक इसकी भनक होने की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन लगातार उठ रहे सवालों ने विभाग को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
यह पहला मौका नहीं है जब अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की कार्यशैली पर सवाल उठे हों। पूर्व में भी उनके कामकाज व्यवहार और निर्णयों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। इसके बावजूद हालात में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आ रहा। स्थानीय लोगों और विभागीय सूत्रों का कहना है कि बार-बार बन रही नकारात्मक सुर्खियों से पुलिस विभाग की छवि को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। आम जनता का भरोसा डगमगाने लगा है वहीं ईमानदार पुलिसकर्मियों का मनोबल लगातार गिरता जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार कुछ उप निरीक्षकों ने दबाव और अनुचित अपेक्षाओं के खिलाफ मौखिक आपत्ति भी दर्ज कराई थी लेकिन उसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। उल्टा आपत्ति जताने वालों को ही किनारे लगाए जाने की चर्चा जोरों पर है।
खास बात यह भी सामने आई है कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लंबे समय तक अपनी कथित कमियों के चलते पुलिस मुख्यालय में अटैच रहे थे। सूत्र बताते हैं कि उनकी सर्विस बुक में भी कई विवादित प्रविष्टियों का उल्लेख है जिसके कारण उन्हें ईपीएस अवार्ड और पदोन्नति जैसे महत्वपूर्ण अवसरों से वंचित रखा गया। इसके बावजूद आरोप हैं कि वर्तमान में उनके गनमैन, ड्राइवर और रीडर तक कथित वसूली व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते कार्यशैली और आदतों में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में लोकायुक्त या अन्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल पूरा पुलिस महकमा असहज स्थिति में है और निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन और विभागीय नेतृत्व इस गंभीर मामले में क्या कदम उठाता है।





