
Media Auditor.मध्यप्रदेश पुलिस महकमे में एक बार फिर अनुशासन और छवि पर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस ट्रेनिंग स्कूल ग्वालियर में पदस्थ एक प्रधान आरक्षक के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि पुलिसकर्मी ने अपनी वर्दी और पद का दुरुपयोग कर इंदौर में एक होटल में करीब डेढ़ महीने तक बिना किराया चुकाए रहकर लाखों का लाभ उठाया।
मामले की जांच के बाद पुलिस मुख्यालय भोपाल स्थित सतर्कता थाने में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 11 के अंतर्गत अपराध क्रमांक 01/26 दर्ज किया गया है। यह कार्रवाई विभागीय सतर्कता जांच के बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर की गई है जिसने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक संबंधित प्रधान आरक्षक वर्ष 2024 में प्रतिनियुक्ति पर इंदौर में पदस्थ था। इसी दौरान उसने अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हुए एक निजी होटल में कमरा लिया और करीब डेढ़ माह तक वहां निवास किया लेकिन इस अवधि का किराया नहीं चुकाया। बताया जा रहा है कि इस दौरान होटल प्रबंधन को लगभग 1.5 लाख रुपये का नुकसान हुआ।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि आरोपी पुलिसकर्मी ने अपने वास्तविक पद से ऊंची रैंक की वर्दी पहनकर होटल स्टाफ पर दबाव बनाने की कोशिश की। वर्दी के इस दुरुपयोग के कारण होटल प्रबंधन उससे किराया मांगने की हिम्मत नहीं जुटा सका। इस तरह उसने सरकारी पद की गरिमा को ठेस पहुंचाते हुए निजी लाभ लिया।
जांच में यह भी स्पष्ट हुआ है कि आरोपी के खिलाफ यह पहला मामला नहीं है। इसके पहले भी ग्वालियर जिले में उसके विरुद्ध एक अन्य आपराधिक प्रकरण दर्ज है जिसकी विवेचना वर्ष 2021 से लंबित है। ऐसे में यह मामला विभागीय निगरानी और अनुशासन व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
पुलिस मुख्यालय के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जा रही है। भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी ताकि पुलिस विभाग की साख बनी रहे और आमजन का भरोसा कायम रह सके।
वर्तमान प्रकरण में एफआईआर दर्ज होने के बाद विवेचना शुरू कर दी गई है। जांच के दौरान संबंधित होटल प्रबंधन, दस्तावेजी साक्ष्य और अन्य तकनीकी पहलुओं की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो आरोपी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ कानूनी दंड भी तय किया जाएगा।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वर्दी में छिपे ऐसे तत्वों पर समय रहते सख्त नियंत्रण क्यों नहीं हो पाता। जहां एक ओर पुलिस विभाग डिजिटल सुधार और पारदर्शिता की दिशा में कदम बढ़ा रहा है वहीं दूसरी ओर इस तरह के कृत्य उसकी छवि को धूमिल करते हैं।
फिलहाल यह देखना अहम होगा कि जांच कितनी तेजी और निष्पक्षता से पूरी होती है और आरोपी के खिलाफ क्या कठोर कदम उठाए जाते हैं। लेकिन इतना तय है कि यह मामला पुलिस महकमे के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आया है।





