फर्जी संविलियन का पर्दाफाश: डभौरा नगर परिषद में नियमों की धज्जियां, फाइलों से निकली कूट रचना की कहानी

Rewa . जिले के नवगठित नगर परिषद डभौरा में सामने आया संविलियन घोटाला अब प्रशासनिक हलकों में भूचाल बन चुका है। विकास और पारदर्शिता के दावों के बीच जांच में जो तथ्य सामने आए हैं उन्होंने फर्जी नियुक्तियों, कूटरचना और नियमों की खुली अवहेलना की परतें उधेड़ कर रख दी हैं। यह मामला न सिर्फ नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही की परीक्षा भी ले रहा है।
ग्राम पंचायत डभौरा, अकौरिया, मगडौर कोटा, गेंदुरहा, पनवार और लटियार को मिलाकर नगर परिषद का गठन किया गया था। गठन के तुरंत बाद ही मानदेय कर्मियों और कुछ अन्य व्यक्तियों को फर्जी तरीके से पंचायतों में कार्यरत दिखाकर नगर परिषद में नियमित पदों पर संविलियन किए जाने की शिकायतें उठीं। जब आयुक्त नगरीय प्रशासन एवं विकास के निर्देश पर जांच हुई तो अभिलेखों में कूटरचना कर नाम जोड़ने की पुष्टि हुई। जांच में साफ पाया गया कि यह पूरी प्रक्रिया मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम 1961 की धारा 7(छ) के प्रावधानों के विपरीत थी।
नगर परिषद गठन के बाद निर्वाचन से पहले तहसीलदार जवा चंद्रमणि सोनी को प्रशासक नियुक्त किया गया था। इसी दौरान दिनांक 08 फरवरी 2021 को संकल्प क्रमांक 12 पारित किया गया जिसके आधार पर कथित संविलियन की कार्यवाही हुई। जांच प्रतिवेदन आने के बाद आयुक्त कार्यालय ने इस संकल्प को निरस्त करने का प्रस्ताव रखा और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू कर दी गई जो फिलहाल प्रक्रियाधीन है।
कानून की किताब में दर्ज मध्यप्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 323 परिषद के ऐसे आदेशों को निलंबित करने की शक्ति देती है जो विधि के अनुरूप न हों या लोकहित के विरुद्ध हों। इसी प्रावधान के तहत सुनवाई की प्रक्रिया शुरू की गई। 31 मई 2024 को रीवा संभागीय कार्यालय में आयोजित कैम्प के दौरान मुख्य नगर पालिका अधिकारी और तत्कालीन प्रशासक को सुनवाई का अवसर दिया गया।
सुनवाई में मुख्य नगर पालिका अधिकारी ने दो टूक कहा कि संविलियन से जुड़े संकल्प क्रमांक 12 को निरस्त किए जाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रेसीडेंट-इन-काउंसिल ने 26 दिसंबर 2023 की बैठक में प्रस्ताव क्रमांक 14 पारित कर संविलियन की कार्यवाही को अवैधानिक मानते हुए स्वयं ही अमान्य कर दिया था। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में पूरे मामले की गंभीरता को उजागर करती है।
दूसरी ओर तत्कालीन प्रशासक चंद्रमणि सोनी ने दावा किया कि वे प्रस्ताव क्रमांक 12 और 13 से असहमत थे और उन्होंने उन प्रस्तावों के सामने हस्ताक्षर नहीं किए। लेकिन जब कार्यवाही पुस्तिका का अवलोकन किया गया तो पृष्ठ क्रमांक 5 के अंत में उनके हस्ताक्षर पाए गए। प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि यदि असहमति थी तो या तो प्रस्ताव को दर्ज ही नहीं होने देना चाहिए था या फिर स्पष्ट रूप से अस्वीकृति लिखित रूप में दर्ज करनी चाहिए थी।
मामला यहीं नहीं रुका। यह विवाद उच्च न्यायालय तक पहुंचा जहां विभिन्न रिट याचिकाओं को एक साथ सुनते हुए 09 दिसंबर 2025 को समेकित निर्णय पारित किया गया। इसके बाद 22 जनवरी 2026 को सभी संबंधित पक्षकारों को पुनः सुनवाई का अवसर दिया गया। इस सुनवाई में चयन समिति से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अंतिम समय पर अतिरिक्त समय मांगे जाने को भी प्रशासनिक सूत्रों ने टालमटोल करार दिया।
अब स्थिति यह है कि संकल्प क्रमांक 12 को औपचारिक रूप से निरस्त करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। यदि यह संकल्प रद्द होता है तो अवैध रूप से संविलियन पाए गए कर्मचारियों की सेवाएं संकट में आ जाएंगी और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई तय मानी जा रही है। डभौरा नगर परिषद का यह मामला साफ संकेत दे रहा है कि फर्जी वादों और कागजी खेल से सच्चाई ज्यादा देर तक नहीं छुपाई जा सकती। आने वाले दिनों में यह घोटाला प्रशासनिक जवाबदेही की मिसाल बन सकता है।





