थाने में ही टूटा कानून? बदेरा पुलिस पर मारपीट का गंभीर आरोप, युवक का पैर टूटा

मैहर। जिले के मैहर अंतर्गत बदेरा थाना क्षेत्र में होली के दिन 04 मार्च 2026 को घटी एक कथित घटना ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि थाना परिसर के अंदर ही पुलिसकर्मियों ने मुकेश चौधरी नामक युवक के साथ बेरहमी से मारपीट की जिससे उसका पैर टूट गया। घटना के बाद से इलाके में आक्रोश का माहौल है और लोगों के बीच तरह तरह की चर्चाएं चल रही हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार होली के दिन किसी विवाद के सिलसिले में मुकेश चौधरी को बदेरा थाने लाया गया था। आरोप है कि पूछताछ के दौरान पुलिसकर्मियों ने उसके साथ मारपीट की। परिजनों का दावा है कि मारपीट इतनी गंभीर थी कि मुकेश का पैर फ्रैक्चर हो गया। घायल अवस्था में उसे पहले स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में प्राथमिक उपचार दिया गया लेकिन स्थिति बिगड़ने पर उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।
सूत्रों के मुताबिक मुकेश को बाद में सतना जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टरों ने उसके पैर में गंभीर चोट की पुष्टि की है। हालांकि मेडिकल रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। परिजन आरोप लगा रहे हैं कि थाना परिसर में हुई इस कथित मारपीट की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
घटना के बाद पीड़ित की पत्नी ने मामले की शिकायत सीएम हेल्पलाइन में दर्ज कराई है और न्याय की मांग की है। उनका कहना है कि यदि उनके पति से कोई गलती हुई भी थी तो कानून के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए थी, न कि इस तरह शारीरिक हिंसा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि थाने में मौजूद अन्य लोगों को भी घटना के बारे में जानकारी है लेकिन डर के कारण कोई खुलकर सामने नहीं आ रहा।
स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश देखा जा रहा है। नागरिकों का कहना है कि पुलिस का काम कानून का पालन कराना है, न कि कानून को अपने हाथ में लेना। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किस संवैधानिक अधिकार के तहत थाना परिसर के अंदर इस तरह की कथित मारपीट की गई? यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि कानून व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।
वहीं बदेरा थाना पुलिस की ओर से आधिकारिक रूप से अभी तक विस्तृत बयान सामने नहीं आया है। अनौपचारिक रूप से कुछ अधिकारियों का कहना है कि युवक को चोट किसी अन्य कारण से भी लग सकती है और पूरे मामले की जांच की जा रही है। हालांकि पुलिस का पक्ष स्पष्ट रूप से सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि थाना परिसर में मारपीट का आरोप प्रमाणित होता है तो संबंधित पुलिसकर्मियों पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज हो सकता है। साथ ही विभागीय जांच भी अनिवार्य हो जाती है। मानवाधिकार संगठनों का भी मानना है कि हिरासत या पूछताछ के दौरान किसी भी प्रकार की शारीरिक हिंसा असंवैधानिक है और इस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पुलिस की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर लगातार बहस चल रही है। आम लोगों का कहना है कि यदि कोई सामान्य नागरिक अपराध करता है तो उसके खिलाफ तुरंत प्राथमिकी दर्ज होती है और गिरफ्तारी भी होती है लेकिन जब आरोप पुलिस पर लगते हैं तो कार्रवाई में देरी क्यों होती है? क्या कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होगा या फिर कमजोर वर्ग के लोगों तक ही सीमित रह जाएगा?
फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है। यदि मामले की निष्पक्ष जांच होती है और दोषियों पर कार्रवाई की जाती है तो इससे जनता का विश्वास बहाल हो सकता है। अन्यथा यह घटना पुलिस-जनता संबंधों में और अधिक अविश्वास की खाई पैदा कर सकती है।





